सितारगंज। दि किसान सहकारी चीनी मिल का घाटा बढ़ता ही जा रहा है। 32 वर्षों में मिल अब तक करीब 402 करोड़ के घाटे में पहुंच गई है। मिल पर गन्ना भुगतान के लिए तीन वर्षों में बैंक से लिए गए 25.28 करोड़ के कर्ज में से अभी भी 16.26 करोड़ का बकाया चल रहा है। वहीं, पिछले साल मिल को 48 करोड़ का घाटा हुआ था। इसमें करीब 29 करोड़ तो चीनी के दाम कम होने का ही घाटा है।
सरकड़ा गांव स्थित दि किसान सहकारी चीनी मिल की स्थापना वर्ष 1980 में की गई और 1984 से पेराई सत्र का आरंभ हुआ। जिसके बाद से मिल धीरे-धीरे घाटे में जाती रही और 32 सालों में यह घाटा बढ़कर 402 करोड़ रुपये हो गया। हर साल चीनी के दाम उसकी लागत से कम होने के कारण मिल को मुनाफा ही नहीं हुआ। वर्तमान में मिल की आर्थिक स्थिति डांवाडोल होने से मिल के भविष्य पर भी संकट बना हुआ है। वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद राज्य में कांग्रेस की सरकार ने 2014-15 से लेकर 2016-17 तक मिल को किसानों का गन्ना भुगतान के लिए ऊधमसिंह नगर डिस्ट्रिक्ट कोआपरेटिव बैंक से 25.28 करोड़ रुपये का कर्ज दिलाया।
इसके बाद मिल प्रबंधन चीनी बेचकर बैंक का कर्ज अदा कर रहा है और अभी भी मिल पर करीब 16.26 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है। प्रधान प्रबंधक विनीत जोशी ने बताया कि चीनी का दाम कम होने और लागत अधिक आने से मिल घाटे में चल रही है। मिल को घाटे से उबारने के लिए चीनी रिकवरी बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। रिकवरी बेहतर होगी तो चीनी उत्पादन भी बढ़ेगा।
1985-86 की रिकवरी 9.84 फीसदी का नहीं टूटा रिकार्ड
दि किसान सहकारी चीनीमिल के 32 वर्षों के इतिहास में सिर्फ वर्ष 1985-86 में ही सर्वाधिक चीनी की रिकवरी 9.84 फीसदी तक पहुंची। जिसका रिकार्ड अभी तक नहीं टूटा है। राज्य गठन के बाद से चीनी रिकवरी भी घटती गई और 2013-14 के पेराई सत्र में सबसे कम 7.82 फीसदी रिकवरी हो गई। इसके बाद मिल प्रबंधन द्वारा चीनी रिकवरी बढ़ाने पर कार्य किए जा रहे हैं। जीएम विनीत जोशी ने इस बार नौ फीसदी से अधिक रिकवरी का लक्ष्य रखा है।
5376.50 रुपये प्रति क्विंटल चीनी की लागत
चीनीमिल में उत्पादित चीनी की लागत 2016-17 में 5376.50 रुपये प्रति क्विंटल थी। जिसके एवज में औसतन 3300 रुपये प्रति क्विंटल चीनी बिकी। मिल प्रबंधन ने 15.97 लाख क्विंटल गन्ने की पेराई कर तकरीबन 1.40 लाख क्विंटल चीनी का उत्पादन किया था। चीनी की लागत से करीब 2076.50 रुपये प्रति क्विंटल का दाम कम मिलने के कारण 29 करोड़ सात लाख दस हजार का घाटा तो चीनी बिक्री में ही हुआ है।