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आखिरकार, निर्णायक मोड़ पर पहुंच ही गई उत्तराखंड की सियासत!

Wed, 13 Apr 2016 07:05 PM IST
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
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हरीश रावत
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25 अप्रैल को लोकसभा का सत्र आहूत करने के साथ ही राष्ट्रपति शासन और सरकार गठन के मुद्दे पर उत्तराखंड अब निर्णायक दौर की तरफ अग्रसर है।
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सत्र बुलाना साफ संकेत दे रहा है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखंड के भविष्य की रणनीति तय कर ली है और वह कुछ ही दिनों में अमल में आ जाएगी। 

कुल मिलाकर केंद्र के सामने अब सीमित विकल्प हैं, या तो राष्ट्रपति शासन को लागू रखने के लिए संसद से मंजूरी ले या फिर किसी की सरकार का गठन करा दें। वर्ना एक ही रास्ता बचेगा और वह है विधानसभा भंग करने का। सूत्रों की माने तो भाजपा, भगत दा के नेतृत्व में सरकार गठन की कवायद में जुटी है।
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भाजपा का पहला प्रयास सरकार बनाने का होगा

भगत सिंह कोश्यारी
तकनीकी तौर पर यदि 25 अप्रैल के बाद भी राष्ट्रपति शासन लागू रहता है तो राष्ट्रपति शासन का प्रस्ताव दोनों सदनों (लोकसभा व राज्यसभा) से पारित कराना होगा।

यह भी विदित है कि भाजपा के पास बहुमत नहीं होने की दशा में राज्यसभा में यह प्रस्ताव गिरना तय है, लिहाजा इस सूरत में भाजपा का पहला प्रयास सरकार बनाने का होगा, जिसकी सुगबुगाहट सियासी हल्कों में साफ नजर आ रही है। अदालत में चल रहे मुकदमों में अभी तक ऐसा कोई आदेश नहीं आया है, जो इस प्रयास में अड़चन बन सके।

विगत 27 मार्च को जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ तब संसद का सत्र गतिमान था। इसके दो तीन दिन बाद ही राष्ट्रपति द्वारा सत्रावसान की अधिसूचना जारी कर दी गई। जबकि सत्र गतिमान था और पांच अप्रैल से दोबारा शुरू होना था।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आरोप भी लगाए थे कि संसद का सत्रावसान इसलिए किया है, ताकि राष्ट्रपति शासन को लागू करने का प्रस्ताव संसद से पास ना कराना पड़े।
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