आपदा के बाद चिपको आंदोलन की नायिका गौरादेवी का गांव रैंणी भी गुमसुम है। रैंणी गांव भी चटक रहा है। जगह-जगह दरारें उठ रही हैं। कोई कहता है कि ऋषि गंगा का पानी जमीन में आ रहा है। कोई कहता है कि जल विद्युत योजनाएं धरती को कमजोर कर रही है।
ऊपर जंगल भी पहले जैसे नहीं रहे। गांव वालों को विस्थापन का डर सता रहा है। ऐसे में गौरा देवी की याद शिद्दत से आती है। गांव के प्रवेशद्वार पर ही चिपको आंदोलन का उद्घोष करता बड़ा गेट है। गौरा देवी ने कहा था- इन जंगलों को बचाओ। प्रकृति को समझो।
हर आपदा हमें गौरा और उनके साथियों के पर्यावरण संघर्ष की याद दिलाती है। रैंणी जाकर भी एकबारगी एहसास नहीं हुआ कि हम गौरा देवी के गांव में हैं। फीका प्रवेश द्वार और कुछ दूरी पर धूल खाती उनकी प्रतिमा। गौरा देवी के बेटे चंदर सिंह एक जीर्ण-शीर्ण संग्रहालय की ओर इशारा करते हैं। स्वर में तल्खी और शिकायत है।
खुद ही कहते हैं- क्या मिलेगा आपको वहां। केवल वन विभाग के कागजात और बक्से हैं। मेरी मां की बस एक प्रतिमा बाकी कुछ नहीं। तपोवन से आगे रैंणी के जंगल नजर आते हैं। कभी यहीं से धरती को बचाने की अलख जगाई गई है। गौरा देवी, गोमती, बाटी देवी, हरकी देवी, सोणी देवी, उमा देवी, ढूका देवी, कलावती देवी सहित कई महिलाओं ने अपने जंगलों को बचाने के लिए संघर्ष छेड़ा था।
पेड़ों से चिपककर बचाया जंगल
वह पेड़ों पर चिपक गई थी, और गीतों में ही उनके नारे थे। चला दीदी, चला भूल्यो जंगल बचोला, यह गीत रैंणी से होते हुए समूचे पहाड़ और फिर दुनिया में गया। रैंणी जंगलों और धरती को बचाने का प्रतीक बना था।
रैंणी के लोगों की बात में सच्चाई है, कि हमें दुनिया में प्रसिद्धि तो मिली पार अपने ही घर में भुला दिया गया। गौरा की बहू जठी देवी कहती हैं मैंने अपनी सास के अंदर चिंगारी देखी थी। मेरा सौभाग्य था कि मैं भी उनके साथ जंगलों को बचाने गई थी।
आंदोलन से सीख क्यूं नहीं ली
हमारी चिंता यह नहीं कि कोई हमारे संघर्षों को याद करे न करे। हमारा दुख यह है कि उस आंदोलन से हमने सीख नहीं ली। यही कारण है जिसकी परिणति केदारनाथ और दूसरी आपदाओं के रूप में दिख रही है।
गौरा की उम्र की ही भादी देवी बात करते-करते सुबकने लगती है। मैं भूल गई, गौरा मुझसे बड़ी थी या छोटी। पर वह हमारी नेता थी। कुछ नहीं पाया हमने। रास्ता तक नहीं बनाया।
रैंणी के लोग कहते हैं जब तक गौरा देवी जिंदा थी, लोग उनसे मिलने आते थे। जर्मनी, जापान और कई देशों के लोग टोलियों में आते थे। अंग्रेज अब भी आ जाते हैं और गौरा देवी के बारे में पूछते हैं।
उनकी प्रतिमा की तस्वीर खींचते हैं। हमसे बातें करते हैं। जिन पहाड़ों को बचाने के लिए गौरा देवी का संघर्ष खड़ा हुआ था, उन पहाड़ों के लोगों को रैंणी से कोई मतलब नहीं रहा।
सरकारों ने की है उपेक्षा
उत्तराखंड बनने के बाद भी सरकारों ने यहां की उपेक्षा की है। नीति, मलारी तक जाने वाली यह सड़क जब-तब ध्वस्त हो जाती है। रैंणी के लोग केदारनाथ की त्रासदी से दुखी है। गांव की मोनिका हो या फिर छपोती, सब आपदा के गम में डूबे हैं।
उन्हें भी डर लगता है कि समय के साथ कहीं रैंणी के लोगों को भी विस्थापन न करना पड़े। अगर ऐसा हुआ तो गौरा देवी का कोई प्रतीक भी नहीं रहेगा।