टिहरी बांध प्रभावित 415 परिवारों के पुनर्वास लिए जमीन मिलना टेढ़ी खीर हो गया है। सरकार ने प्रभावितों के पुनर्वास को वर्ष 2016 में मंशा देवी, दूधूपानी, भानियावाला, पशुलोक और आईडीपीएल में जमीन चिह्नित की थी, लेकिन भूमि हस्तांतरण का विवाद तीन साल में भी नहीं सुलझ पाया है। इससे प्रभावित परिवारों का पुनर्वास अधर में लटका है।
झील के आसपास भागीरथी और भिलंगना घाटी के 45 गांव के 415 परिवारों को वर्ष 2010-11 में हुए भूगर्भीय सर्वे में विशेषज्ञों ने खतरे की जद में पाया था। विशेषज्ञों ने सरकार को संबंधित परिवारों के पुनर्वास की सलाह दी थी, लेकिन पुनर्वास निदेशालय को प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए जमीन नहीं मिल पाई थी। अगस्त वर्ष 2016 में सरकार के निर्देश पर पुनर्वास निदेशालय ने ऋषिकेश में पशुपालन की 14.21, आईडीपीएल की 39.21, मंशादेवी, दूधूपानी से बीबीवाला 65.31, भानियावाला के जाखन में 39.21 हेक्टेयर भूमि वन विभाग की पुनर्वास के लिए चिह्नित कर केंद्र सरकार को एनओसी के लिए भेजा था, लेकिन आईडीपीएल, पशुपालन ने भूमि देने से इनकार कर दिया। जबकि विभाग ने वन भूमि अधिक होने से लेकर तकनीकी कारण गिनाते हुए भूमि की स्वीकृति नहीं दी है। भूमि नहीं मिलने से नौ साल बाद भी प्रभावितों को आवासीय एवं कृषि भूखंड आवंटित नहीं हो पाए हैं। पुनर्वास नीति के तहत प्रत्येक परिवार को 10 बीघा कृषि और दो सौ वर्गमीटर का आवासीय भूखंड दिया जाना था, लेकिन पुनर्वास के अभाव में प्रभावित परिवार जर्जर मकानों में रहने को मजबूर है। आंशिक डूब क्षेत्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष सोहन सिंह राणा, भटकंडा के प्रधान प्रदीप भट्ट ने बताया कि वर्षों से प्रभावितों के साथ धोखा हो रहा है। लगातार पुनर्वास की मांग की जा रही है, लेकिन शासन-प्रशासन की लापरवाही से पुनर्वास नहीं हो रहा है।
मंशादेवी, दूधूपानी, भानियावाला में चिह्नित वन भूमि की एनओसी नहीं मिल पाई है, जबकि पशुलोक, आईडीपीएल की जमीन भी नहीं मिल पाई है। इससे पुनर्वास संबंधी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी है।
-आरके गुप्ता, ईई अवस्थापना खंड पुनर्वास ऋषिकेश।