तीर्थ और धर्म नगरी ऋषिकेश, हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए आने वाले करोड़ों श्रद्धालु इससे अनजान हैं कि वह टिहरी झील के दूषित पानी में डुबकी लगा रहे हैं और उसी का आचमन भी कर रहे हैं। दरअसल टीएचडीसी प्रशासन टिहरी बांध परियोजना से बीते एक दशक से हर साल करोड़ों रुपये का राजस्व तो अर्जित कर रहा है, लेकिन इसकी सफाई की उसे कोई चिंता नहीं है।
परियोजना में झील की सफाई का प्रावधान ही नहीं किया गया है। लिहाजा झील में अधजले शव और बहकर आए जानवरों के शव, कूड़ा-कचरे के ढेर जगह-जगह जमा हैं। इससे गंगा के प्रति लोगों की आस्था तो खंडित हो ही रही है। साथ ही झील में जमा होने वाली गंदगी से आसपास के दर्जनों गांवों के लोग भी खासे परेशान हैं।
मैदानी इलाकों में गंगा प्रदूषण पर कार्रवाई करने वाली नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) और गंगा स्वच्छता का ढोल पीटने वाली केंद्र सरकार ने भी अभी तक मामले का संज्ञान नहीं लिया है। कारपोरेशन 2005-06 से बांध से हर साल करोड़ों का राजस्व अर्जित कर रहा है, लेकिन झील में जमा होने वाली गंदगी की सफाई नहीं करा रहा है।
क्या कहते हैं डीएम
हां टिहरी बांध की झील से गंगा मैली हो रही है। दरअसल टीएचडीसी का ध्यान सिर्फ रेवेन्यू अर्जित करने पर है। उसे गंगा की पवित्रता और करोड़ों लोगों की आस्था की कोई चिंता नहीं है। झील की नियमित रूप से सफाई की जिम्मेदारी टीएचडीसी की है, लेकिन उसने किसी रूप में इसका प्रावधान नहीं किया है। लिहाजा मामले में प्रशासन नियमानुसार कार्रवाई करेगा।
इंदुधर बौड़ाई, जिलाधिकारी टिहरी गढ़वाल।