नई टिहरी पीजी कालेज में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित सेमिनार में मौजूद विशेषज्ञ।
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हिमालय क्षेत्र की जलवायु परिवर्तन, जलीय जीव और जैव विविधताओं के संरक्षण को आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में विषय विशेषज्ञों ने कहा कि हिमालय पर जन दबाव और प्रदूषण का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। इकोलॉजी सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए समय रहते सामूहिक प्रयास करना जरूरी है।
पीजी कालेज सभागार में महाविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग की ओर से आयोजित सेमिनार के दूसरे दिन मुख्य वक्ता प्रो. डब्ल्यूएस लाकरा ने कहा कि हिमालय क्षेत्र की जलीय जैव विविधता के संरक्षण के लिए सरकार और सामाजिक स्तर से प्रयास किए जाने चाहिए। औद्योगिकीकरण से नदी-नालों का दोहन किया जाना चिंताजनक है। प्रो. वीपी सती ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों मेें बांध और सड़कों की खुदाई से भूगर्भीय हलचल बढ़ रही है और भविष्य में उच्च और मध्य हिमालय क्षेत्र में भूकंप आ सकते हैं। इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डा. नवीन जुयाल ने कहा कि लगातार घटते ग्लेशियरों से जीवनदायिनी गंगा, यमुना, शारदा का अस्तित्व भी खतरे में है। एसआरटी परिसर के प्रो. एनके अग्रवाल ने गंगा और जलीय जैव विविधता संरक्षण के उपायों पर शोध पत्र जारी किया। उन्होंने कहा कि गंगा नदी में पाई जाने वाली महासीर प्रजाति की मछलियां विलुप्ति की कगार पर थीं, लेकिन टीएचडीसी और प्रशासन के प्रयासों से टिहरी बांध की झील में महासीर का जीवन सुरक्षित दिख रहा है। सेमीनार में पहुंचे विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र के संरक्षण पर शोध पत्र प्रस्तुत किए। सेमिनार में प्रो. एसके मल्होत्रा, वैज्ञानिक मुरुगानंदन, प्रो. जेपी भट्ट, ओपी गुसाईं, प्राचार्य डा. अशोक कुमार, आशीष थपलियाल, आयोजक सचिव डा. विजय प्रकाश सेमवाल, कविता काला, डा. अरविंद मोहन पैन्यूली, डा. संजीव नेगी, डा. डीपीएस भंडारी, डा. सुशील कगड़ियाल, शालिनी रावत, आरती खंडूड़ी और कुलदीप रावत मौजूद थे।