राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत उपचार के लिए देहरादून भेजे जा रहे बच्चों के अभिभावकों को वहां अस्पताल के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। हर जगह से निराशा मिलने के बाद थक हारकर परिजनों को स्वयं के खर्चे पर ही बच्चों का इलाज कराने को मजबूर होना पड़ रहा है।
स्कूल हेल्थ कार्यक्रम के तहत 18 वर्ष तक के बच्चों को सरकार की ओर से निशुल्क इलाज देने की व्यवस्था की गई है, लेकिन दून में बैठे अधिकारी राहत देने के बजाए मरीज के परिजनों को अस्पतालों के चक्कर कटवा रहे हैं। जिससे थक हारकर कई लोगों को स्वयं ही अपने खर्च पर इलाज कराने को मजबूर हैं। इसका उदाहरण प्रतापनगर के कुराण गांव का गौरव (10) है।
बच्चे के पिता केशर सिंह ने बताया कि बच्चे की जांघ में दर्द होने पर उसे स्कूल हेल्थ कार्यक्रम के तहत 21 नवंबर को जिला चिकित्सालय से देहरादून कोरोनेशन अस्पताल डीईआईसी (डिस्ट्रिक अर्ली इंटरवेशन सेंटर) रेफर किया गया था। जहां से डीईआईसी ने दून अस्पताल भेजा, तो उन्होंने भी एम्स ऋषिकेश जाने की सलाह दी।
लेकिन एम्स में पहले इलाज करा चुके परिजन वहां नहीं गए। मजबूरन उन्हें जौलीग्रांट हिमालयन इंस्टीट्यूट में इलाज कराना पड़ा, जिस पर उन्हें 60 हजार रुपये खर्च करने पड़े। दूसरा उदाहरण मास्टर अभिनव का है। उन्हें भी 15 फरवरी को कोरोनेशन डीईआईसी रेफर किया गया था। देहरादून अस्पतालों के कई चक्कर काटने और स्वास्थ्य मंत्री के आदेश के बावजूद अभी तक उन्हें कानों की मशीन नहीं मिली।
जरूरतमंदों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए। परिजनों को स्वयं इलाज कराना पड़ रहा है, तो यह ठीक नहीं है। ऐसे लोग सभी पत्रावलियां दिखाएं, उसके बाद समाधान करने का प्रयास किया जाएगा।
- डा. अर्जुन सिंह सेंगर, सीएमओ, टिहरी।