नई टिहरी। बांध की झील में डूब चुके पैतृक शवदाह घाटों के स्थानों पर नए घाटों का निर्माण न होने से प्रभावितों को कई किमी का सफर तय करना पड़ रहा है।
वर्ष 2005 में झील बनने के कारण भागीरथी, भिलंगना और कोटेश्वर घाटी में स्थित ग्रामीणों के पैतृक शवदाह घाट डूब चुके थे। प्रभावितों के धरना-प्रदर्शन के चलते वर्ष 2010-11 में पुनर्वास निदेशालय और टीएचडीसी के बीच पहले चरण में कोटीकालोनी, पिलखी, घोंटी, देवल, मदननेगी, गोरण, सिरांई, छाम, सुनारगांव और कोटेश्वर में घाटों के निर्माण को सहमति बनी थी, जिनके निर्माण पर करीब पांच करोड़ खर्च होने थे। वर्ष 2015-16 में टीएचडीसी ने प्रथम किश्त के रूप में पुनर्वास निदेशालय को एक करोड़ की धनराशि दी थी, जिस धनराशि से पुनर्वास निदेशालय ने 10 स्थानों पर घाटों का निर्माण शुरू करवाया था। लेकिन द्वितीय चरण की धनराशि न मिलने के कारण घाटों का निर्माण पूरा नहीं हो पाया है। घाटों का निर्माण न होने से कोटेश्वर घाटी, चंबा, नई टिहरी, जाखणीधार के प्रभावित शवों के अंतिम संस्कार के लिए 20-30 किमी दूर कोटीकालोनी, जीरो प्वाइंट, प्रतापनगर, भिलंगना, थौलधार आदि के ग्रामीण छाम, पिलखी, जलकुर नदी में कई किमी दूर वाहनों से जाने को मजबूर हैं।
कोट
घाटों का निर्माण पूरा करवाने को टीएचडीसी से अवशेष बजट की मांग की गई है। उम्मीद है कि एक माह के अंदर बजट मिल जाएगा, जिसके बाद शवदाह घाटों का निर्माण पूरा किया जाएगा।
-सुबोध मैठाणी, अधिशासी अभियंता अवस्थापना खंड पुनर्वास।