नैनबाग (टिहरी)। ‘मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती हैं। पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है’ इस कहावत को दिव्यांग माउंटेनियर पदमश्री अरुणिमा सिन्हा ने चरितार्थ कर दिखाया है।
देवांशी स्पोर्ट्स स्कूल के वार्षिकोत्सव में शिरकत करने पहुंची दिव्यांग माउंटेनियर पदमश्री अरुणिमा सिन्हा ने छात्र-छात्राओं के बीच अपने अनुभव साझा किए। बताया कि 12 अप्रैल 2011 को किसी काम से दिल्ली जा रही थी। रास्ते में कुछ लुटेरों ने चेन छीनने के लिए उसे चलती ट्रेन से नीचे धकेल दिया। इस दौरान उनके दोनों पैर ट्रेन के नीचे आ गए थे। पूरी रात उस दिन 49 ट्रेन वहां से गुजर गई, लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। दोनों पटरियों के बीच सारी रात बेसुध पड़ी रही। सुबह अपने आपको बरेली हॉस्पिटल में पाया। डॉक्टर ने बताया कि एक पैर काटना पड़ा। रीढ़ की हड्डी और दूसरा पैर में भी फैक्चर हो गया है। उस दिन मैने दृढ़ निश्चय कर ठान लिया कि अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाना है।
एक नया इतिहास रचने के लिए वह एवरेस्ट विजेता बछेंद्री पाल से मिली। मेरी हालत देखकर उनकी आंखें भर आई, लेकिन मेरी हिम्मत देख उन्होंने कहा तुम कर सकती हो। 21 मई 2013 को एवरेस्ट फतह करने में कामयाब रही। उसके बाद दुनिया की छह ऊंची पहाड़ियों पर चढ़कर कामयाबी का लोहा मनवाया। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पद्मश्री से सम्मानित किया। अरुणिमा सिन्हा ने कहा कि आदमी विकलांग शरीर से नहीं, मन से होता है। बाद में अरुणिमा ने कहा कि ‘अभी तो इस बाज की असली उड़ान बाकी है, अभी तो इस परिंदे का इम्तिहान बाकी है अभी तो मैंने लांगा है समुंदरों को, अभी तो सारा आसमान बाकी हैं...’