नैनबाग (टिहरी)। देवांशी स्पोर्ट्स स्कूल के वार्षिकोत्सव में बांसुरी वादक सरजू वर्मा ने बांसुरी से जौनसारी, गढ़वाली, हिंदी और बॉलीवुड गीतों की शानदार प्रस्तुतियां देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
जौनसारी गीत हमें बाराती आए तेरे गांव दे, ओ रोटियां बेटा, भाई मामा छमरोटिया, कुमाऊंनी गीत बेडु पाको बारा मासी, गढ़वाली गीत जे बोला भगवती नंदा देवी, अगलाड़ की माछी, फिर टिकुलिए और हिंदी बॉलीवुड गीत देखा एक बार तो ये दिल खिले हुए, तेरे मेरे होठों पर प्यार का ये गीत मितवा की शानदार प्रस्तुति दी। स्कूल के संस्थापक और पूर्व मंत्री नारायण सिंह राणा ने कहा कि बांसुरी वादक सरजू वर्मा ने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया। सरजू दोनों आंखों से देख नहीं सकते हैं, फिर भी बांसुरी वादन के क्षेत्र में देश-विदेश तक अपनी पहचान बनाई। चकराता क्षेत्र के निवासी सरजू वर्मा वर्तमान में कालसी के एकलव्य विद्यालय में बांसुरी अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। वर्मा ने कहा कि पहाड़ की संस्कृति हमें विरासत में मिली है और हमारा कर्तव्य है कि हम सब इस संस्कृति को संजो कर रखें। हमारे क्षेत्र में प्रतिभा की कमी नही हैं जरूरत है उन्हें तराशने की। मुझे भी तराशकर कर कबील बनाने का श्रेय नारायण सिंह राणा को जाता है।
अतिथियों को भाया पहाड़ी व्यंजन
देवांशी स्पोर्ट्स स्कूल के वार्षिकोत्सव में अतिथियों को पहाड़ के पारंपरिक व्यंजन परोसे गए। स्थानीय महिलाओं के हाथों से तैयार किए गए असक्या, पिनियां, मंडवे की रोटी, कुल्थ की दाल, चटनी, चिलडे, ससरो का साग, चोपड़ आदि व्यंजन अतिथियों को खूब भाए। पहाड़ी व्यंजनों का आनंद लेेने के बाद महिला अतिथियों ने इन व्यंजनों को बनाने की विधि की जानकारी ली।
नारायण सिंह राणा ने स्वरचित कविता से अपनी और अरुणिमा सिन्हा की कामयाबी के बारे में बताया ।
मेहनत से उठा हूं, मेहनत का दर्द जानता हूं,
आसमां से ज्यादा जमीं की कद्र जानता हूं।
लचीला पेड़ था जो झेल गया आंधियां,
मैं मगरूर दरख्तों का हश्र जानता हूं।
छोटे से बड़ा बनना आसां नहीं होता,
जिंदगी में कितना जरूरी है सब्र जानता हूं।
मेहनत बढ़ी तो किस्मत भी बढ़ चली,
छालों में छिपी लकीरों का असर जानता हूं।
बेवक्त, बेवजह, बेहिसाब मुस्कुरा देता हूं,
आधे दुश्मनों को तो यूं ही हरा देता हूं!!
काफी कुछ पाया पर अपना कुछ नहीं माना,
क्योंकि एक दिन राख में मिलना है ये जानता हूं।