पहाड़ में जलप्रलय की विभीषिका के बाद केदारघाटी से लेकर दूनघाटी तक एक ही पुकार सुनाई दे रही है। कोई है.. बचाओ उन्हें... बताओ हमें.. कहां हैं हमारे अपने।
सिनेमाई पर्दे पर 1984 में यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म ‘मशाल’ में मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार भी घायल हुई अपनी पत्नी को अस्पताल पहुंचाने के लिए कुछ इसी तरह लोगों के सामने गिड़गिड़ाते हैं।
लेकिन कोई नहीं सुनता। यहां भी सीन कुछ ऐसा ही है। देश के कोने-कोने से अपनों की ढूंढ-खोज में दून एयरपोर्ट पहुंचे लोग इधर से उधर भटक रहे हैं। लेकिन कहीं से उन्हें वाजिब जवाब नहीं मिल रहा। नेताओं और प्रशासन को कोस-कोसकर उमस भरी गर्मी में संयम जवाब दे गया तो लोग सड़क पर उतर आए और हाईवे जाम कर दिया।
दौड़े चले जा रहे थे
दून एयरपोर्ट का एक गेट देहरादून की तरफ से है तो दूसरा ऋषिकेश की तरफ से। दोनों गेट के बीच की दूरी करीब तीन किलोमीटर बैठती है। ऐसे में केदारघाटी से आने वाले रेसक्यू हेलीकाप्टर किस गेट बैठ जाए पता नहीं। जहां पंखों की आवाज सुनाई दे, लोग उसी ओर दौड़े चले जा रहे थे। इस उम्मीद में कि शायद इस बार मेरा कोई अपना आ गया हो।
लेकिन अधिकतर नाउम्मीद होकर फिर नजरें आसमान की ओर गढ़ा देते। चौपर के पंखों की गड़गड़ाहट और लोगों के दिलों की धड़कने एक गति से तेज दौड़ती। लोग उसी गति से एक गेट से दूसरे गेट की ओर दौड़ लगा देते। सुबह 10 बजे के आसपास सेना के दो हेलीकाप्टर कुछ लोगों को लेकर एयरपोर्ट पहुंचे। इनमें कुछ घायल भी थे, जिन्हें सीधे जौलीग्रांट अस्पताल ले जाया गया।
इसके बाद करीब दो बजे तक सन्नाटा छा गया। इधर से राहत सामग्री लेकर चौपर रवाना तो हुए, लेकिन दो बजे तो कोई
वापस नहीं आया। खबर आई कि केदारघाटी का मौसम फिर बिगड़ गया है। हेलीकाप्टर उड़ान नहीं भर पा रहे हैं। लोगों की सांसे जैसे थम सी गई। लेकिन दो बजे के बाद फिर असमान में उम्मीद के पंख दिखाई देने लगे। हेलीकाप्टरों के वापस आने का सिलसिला फिर शुरू हो गया।
रामबाड़ा में जिंदा हैं उम्मीदें
रेवाड़ी, हरियाणा के मोनू वर्मा बदहवाश हालत में एयरपोर्ट पर नेताओं के पीछे दौड़ लगा रहे थे। वे जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, रामबाड़ा में लोग जिंदा हैं, मेरी अपने पापा से बात हुई है। वे पचास लोगों के एक दल के साथ हैं। उन्हें वहां से बाहर निकलो। हर कोई अपनी ओर से उन्हें तसल्ली दे रहा था।
पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखारियाल निशंक से टकराए तो उन्होंने मोनू को तसल्ली भरी खबर दी। आज सेना के कुछ जवान रामबाड़ा में उतर चुके हैं। वे वहां छोटे चौपर के उतरने लायक प्लेटफार्म तैयार कर रहे हैं। देरशाम तक रेसक्यू शुरू कर दिया जाएगा।
मैं पब्लिक के लिए आया हूं
अशोक कसौधन पालिकाध्यक्ष रेवाड़ी, फरीदाबाद अयोध्या एयरपोर्ट पर बदइंतजामी से दुखी थे। न कहीं रेसक्यू कर लाए गए लोगों की सूची, न इसका पता की कौन कहां किस हाल में फंसा है। उनकी शिकायत वाजिब थी। सरकार की ओर से एयरपोर्ट पर कोई न कोई समक्ष अधिकारी नियुक्त किया जाना चाहिए था, जो लोगों यथास्थिति के बारे में अवगत कराता। उनका साफ कहना था यात्रा में उनका कोई नहीं गया है, लेकिन उनके क्षेत्र के लोग इस आपदा में फंसे हैं। वे उनके लिए यहां आए हैं।
प्रलय के बाद मंदिर भी अछूता नहीं
केदारनाथ धाम में तबाही के बाद मीडिया में आए हवाई चित्रों को देखने के बाद कहा जा रहा था कि आसपास सब तबाह हो गया, लेकिन मंदिर सुरक्षित है। वासी, मुंबई की रहने वाली बबीता की मानें तो मंदिर को भी खासा नुकसान पहुंचा है। अन्य लोगों के साथ अपनी बेटी का हाथ थामे बबीता को भी बृहस्पतिवार को रेसक्यू किया गया।
जौलीग्रांट एयरपोर्ट पहुंचने पर उन्होंने बताया कि मंदिर में केवल शिवलिंग सुरक्षित है, इसके अलावा सबकुछ तहस-नहस हो चुका है। विभीषिका के बाद वे दो दिन मंदिर के अंदर ही रहे। चार दिन कैसे काटे, इस पर बबीता कहती हैं, जिंदा आ गए, ऊपर वाले का शुक्र हैं। पानी के साथ लाशों का जो सैलाब देखा है, भगवान ऐसा दिन किसी को न दिखाए।
पहाड़ी पर गुजारीं चार रातें
पूना, (महाराष्ट्र) की जयमेत्री गुरुव और उनके पति जयवंत गुरुव एयरपोर्ट पर एक-दूसरे का हाथ थामे थे। वे 66 लोगों के साथ केदारनाथ गए थे। लेकिन अब दोनों पति-पत्नी लौटे हैं। जयमेत्री रुंधे गले से बताती हैं, केदारनाथ से उतरने के बाद हम देर शाम रामबाड़ा पहुंचे थे। रात को जब जलप्रलय शुरू हुआ तो सब लोग इधर-उधर भागने लगे।
हम दोनो (पति-पत्नी) ने एक दूसरे का हाथ नहीं छोड़ा। सबके साथ एक पहाड़ी की ओर दौड़ लगा दी। घर से चने ले गए थे, कुछ प्रसाद भी था, वही चबाते रहे। सबकुछ खत्म हो गया तो घास-पत्ते खाने से भी परहेज नहीं किया। सेना का शुक्रिया, उन्होंने हमें देख लिया और बचा लाए।
जिंदगी भर नहीं भूलेगी वह रात
ग्वालियर की 65 वर्षीय अंजू भटनागर को केदारनाथ में आई आपदा का दिल दहला देने वाला दृश्य जिंदगी भर याद रहेगा। अपने जीवन में पानी की प्रचंडता को बेहद करीब से देखने वाली वृद्धा को जिंदगी बच जाने पर सुकून है। पति महेंद्र भटनागर के साथ यात्रा पर आई अंजू बताती हैं कि आपदा ने जो किया वह प्रकृति का प्रकोप है, लेकिन सरकार ने अपनी जिम्मेदारी अच्छे से नहीं निभाई। बुजुर्ग दंपति का हिमालयन अस्पताल में उपचार चल रहा है।