केदारनाथ आपदा के तीन वर्ष बाद भी केदारघाटी में बहे झूला पुलों का पुनर्निर्माण नहीं हो पाया है। ग्रामीण जर्जर ट्रालियों या लकड़ी के फट्टों के सहारे आवाजाही को मजबूर हैं। दूसरी तरफ प्रशासन की ओर से सुस्त गति से हो रहे काम को लेकर निर्माणदायी संस्था लोक निर्माण विभाग को भेजे नोटिस और निर्देश भी बौने होकर रह गए हैं।
केदारघाटी में आठ स्थानों पर वर्तमान में ग्रामीण ट्राली और फट्टों के सहारे मंदाकिनी नदी को पार कर अपने गंतव्य तक पहुंच रहे हैं। ट्राली जहां जर्जर होकर हादसों का सबब बनी हुई है,वहीं गर्मी के साथ नदी का पानी बढ़ने से फट्टों के बहने के का खतरा भी बना हुआ है। बावजूद लोक निर्माण विभाग की ओर से पुलों के निर्माण में तेजी नहीं लाई जा रही है। बेडूबगड में नदी में फट्टे डालकर आवाजाही हो रही है। यहीं स्थिति कालीमठ में भी है। जबकि जिला मुख्यालय के समीप माई की मंडी में ट्राली के सहारे भरदार पट्टी के ग्रामीण अपने घरों को पहुंच रहे हैं। क्षेत्र पंचायत सदस्य सुलोचना देवी का कहना है कि ढाई वर्ष से पुलों के निर्माण को लेकर विभागीय अधिकारी सिर्फ आश्वासन दे रहे हैं। स्थिति यह है कि जिलाधिकारी की ओर से विभागीय सचिव को दो बार इस संबंध में पत्र भेजने के बाद भी स्थिति जस की तस है।
विदित हो कि 16/17 जून 2013 की आपदा में मंदाकिनी और अलकनंदा नदी पर छोटे-बड़े कई पुल धराशाई हो गए थे। आपदा के बाद शासन के निर्देश लोनिवि द्वारा माई की मंडी, सिल्ली, विजयनगर, बेडूबगड़, चंद्रापुरी, फाटा, कालीमठ आदि स्थानों में ट्राली लगाई गई। इन ट्रालियों से 10 से अधिक लोग घायल हुए, जिसमें एक नेपाली बच्चे का हाथ पूरी तरह कट गया था।
आपदा में बहे झूला पुलों के स्थान पर निर्माणाधीन आठ पुलों के निर्माण बरसात से पहले पूरा करने के लिए लोनिवि को निर्देश दिए गए हैं। इस संबंध में विभागीय उच्चाधिकारियों को भी समय-समय पर पत्राचार किया जा रहा है।- डा. राघव लंगर, जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग