अगस्त्यमुनि ब्लॉक के कोट मल्ला गांव निवासी व पर्यावरणविद् जंगली के मिश्रित जंगल में आर्किड की दस प्रजातियां तैयार की जा रही हैं। जैव विविधता को संरक्षित करने में इस प्रजाति की अहम भूमिका है। साथ ही यह काश्तकारों की आय बढ़ाने का सबसे बड़ा माध्यम भी बन सकता है।
सुगंधित, सुंदर और लंबे समय तक तरोताजा दिखने वाला आर्किड अब जिले की जैव विविधता को भी संरक्षित करेगा। साथ ही कई परिवारों की रोजीरोटी का जरिया भी बनेगा। औषधीय गुणों से भरपूर इस पादप की दस प्रजातियों का पर्यावरणविद् जगत सिंह जंगली के मिश्रित जंगल में उत्पादन हो रहा है। इसमें फॉक्सटेल, कैंथले, कंबईडीयम शामिल हैं। यह पुष्प पादप बेहतर जल शोषक होने के साथ ही वायु प्रदूषण को कम करने में अहम भूमिका निभाता है। दूसरी तरफ रुद्रप्रयाग वन प्रभाग की ओर से केदारघाटी के जामू में भी आर्किड की नर्सरी तैयार की जाएगी। पर्यावरण विशेषज्ञ राघवेंद्र सिंह चौधरी का कहना है कि आर्किड का उपयोग त्वचा रोग, दमा, दस्त, दिल आंत, खांसी की दवा बनाने में किया जाता है। साथ ही वनीला से इत्र व आइसक्रीम बनाने में भी इसे शामिल किया जाता है।
विश्वभर में आर्किड की 15 हजार प्रजातियां
भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के अनुसार विश्वभर में आर्किड की 15 हजार से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। इसमें से 1256 हमारे देश में हैं। इन प्रजातियों में से 346 उत्तराखंड में पाई जाती हैं। आर्किड को एपीफाइटिक, स्थलीय और माइक्रोहेट्रोटॉफिक के तौर पर तीन वर्गों में बांटा गया है।
आर्किड जैव विविधता को संरक्षित करने में सबसे अहम भूमिका निभाता है। इसकी जड़ें मिट्टी की पकड़ को मजबूत बनाती हैं। साथ ही नमी को बनाए रखती हैं। यही नहीं आर्किड आर्थिकी का भी सबसे बड़ा माध्यम है, इसलिए इसका वृहद रोपण बहुत जरूरी है। - जगत सिंह जंगली, पर्यावरणविद् कोट मल्ला/रुद्रप्रयाग।
विभागीय स्तर पर आर्किड के उत्पादन के लिए विशेष सेल गठित की गई है। पहले चरण में जामू स्थित नर्सरी में इसकी पांच प्रजातियों का रोपण किया जाना है। उसकी सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। आने वाले समय में रेंजवार चिह्नित स्थानों पर आर्किड की विभिन्न प्रजातियों का रोपण कर इसे व्यवसायिक रूप देकर ग्रामीणों को जोड़ा जाएगा।
- वैभव कुमार सिंह, डीएफओ रुद्रप्रयाग वन प्रभाग।