बाबा केदार की यात्रा का विश्वनाथ मंदिर से विशेष संबंध है। कपाट खुलने व बंद होने पर बाबा केदार की डोली यहां पहुंचती है। यहां पर मंदिर समिति के मुख्य पुजारी वर्षभर पूजा-अर्चना करते हैं। यहां प्राचीन कोठा मौजूद है, जो जर्जर स्थिति में है। लोगों का कहना है कि यह कोठा मंदिर की सुरक्षा की दृष्टि से भी अहम है। वहीं शीतकालीन गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में भी कोठा जर्जर हाल में है। मंदिर समिति ने इन कोठों के पुनरुद्धार की योजना बनाई है। इस पर करीब एक करोड़ 80 लाख रुपये खर्च होने अनुमान है। इसके अलावा मंदिर समिति गौरीकुंड में अपने पठालवाले भवन की मरम्मत के साथ यहां पर भोगमंडी, भंडारण कक्ष और धर्मशाला का निर्माण करेगी। सोनप्रयाग में भी एक धर्मशाला का निर्माण होगा। इन सभी कार्यों के लिए 70 लाख रुपये से अधिक के प्रस्ताव तैयार हैं। समिति के सूत्रों की मानें तो शासन से 1 करोड़ 75 लाख रुपये की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।
कोठा को लेकर मान्यता
राजशाही के समय से गढ़वाल में कोठा निर्माण की परंपरा रही है। कोठा कई कमरों के भवन को कहते थे। ये कानून व्यवस्था के मुख्य स्थान हुआ करते थे। मठ-मंदिरों के चारों तरफ भी इस तरह के भवनों का निर्माण किया जाता है, जिन्हें कोठा कहा गया। इन कोठों पर रावल सहित मंदिर समिति के कर्मचारी/पुजारी व अन्य सुरक्षा व्यवस्था के लिए तैनात लोग रहते थे।
केदारनाथ यात्रा मार्ग से लगे विश्वनाथ मंदिर, ओंकारेश्वर मंदिर सहित गौरीकुंड व सोनप्रयाग में समिति की ओर से होने वाले कामों की योजना तैयार कर दी गई है। शासन से भी कई प्रस्तावों को स्वीकृति मिल गई है। आगामी वर्षों में श्रद्धालुओं को समिति सभी जरूरी सुविधाएं प्रदान करेगी। - बीडी सिंह, मुख्य कार्याधिकारी बीकेटीसी