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क्वीली, कुरझण और जौंदला गांव में नहीं खेली जाती होली

Fri, 10 Mar 2017 09:49 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
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होली
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अबीर गुलाल के साथ होल्यार गांव से लेकर बाजारों में पहुंचने लगे हैं। जिले के नगरीय क्षेत्रों में भी बैठकी होली का दौर शुरू हो गया है, लेकिन अगस्त्यमुनि ब्लाक की तल्ला नागपुर पट्टी के क्वीली, कुरझण और जौंदला गांव इस उत्साह और हलचल से कोसों दूर हैं। यहां न कोई होल्यार आता है और न ग्रामीण एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। पिछले नौ दशक से भी अधिक समय से इन गांवों में होली नहीं मनाई गई है।
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जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर बसे इन तीन गांवों की बसागत 20 वीं सदी के मध्य की मानी जाती है। बताया जाता है कि जम्मू-कश्मीर से कुछ पुरोहित परिवार अपने यजमान और काश्तकारों के साथ करीब 370 वर्ष पूर्व यहां आकर बस गए थे।

ये लोग, तब अपनी ईष्टदेवी मां त्रिपुरा सुंदरी की मूर्ति और पूजन सामग्री को भी साथ लेकर आए थे, जिसे गांव में स्थापित किया गया। आराध्य को वैष्णो देवी की बहन माना जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी कुलदेवी को होली का हुड़दंग पसंद नहीं है, इसलिए वे सदियों से होली का त्योहार नहीं मनाते हैं। बताते हैं कि डेढ़ सौ वर्ष पूर्व इन गांवों में होली खेली गई तो, तब यहां हैजा फैल गया था और बीमारी से कई लोगों की मौत हो गई थी। तब से आज तक गांव में होली नहीं खेली गई है।
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एचएनबी केंद्रीय विवि श्रीनगर गढ़वाल के लोक संस्कृति और निष्पादन केंद्र के पूर्व निदेशक व क्वीली गांव के निवासी डा. डीआर पुरोहित बताते हैं कि गांव में उनकी 15 पीढ़ी हो गई हैं। जब से होश संभाला है, होली न खेलनी की बात सुनी हैं।

पुरोहित पूर्वजों का हवाला देते हुए वे बताते हैं कि उनकी कुलदेवी को होली के रंग अच्छे नहीं लगते हैं, इसलिए यह त्योहार नहीं मनाया जाता है। जौंदला के अनूप नेगी का कहना है कि उन्होंने अपने दादा से सुना था कि एक बार कुछ लोगों ने होली पर एक-दूसरे को रंग लगाया था, तो नुकसान हुआ था। गांव में कई लोग बीमार हो गए थे।
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