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मूलभूत सुविधाओं से वंचित कालीमठ घाटी

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उत्तराखंड राज्य बनने के बाद चार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं लेकिन कालीमठ घाटी के गांवों में जरूरी विकास भी नहीं हो पाया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंक जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए आज भी ग्रामीण मीलों नाप रहे हैं।
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ऊखीमठ तहसील के कालीमठ घाटी के 13 गांव राज्य निर्माण के दो दशक के सफर के बाद भी विकास की मूलधारा में शामिल नहीं हो पाए हैं। राज्य सरकारों व जनप्रतिनिधियों से क्षेत्रीय विकास को लेकर आश्वासन तो मिले लेकिन सुविधाएं धरातल पर नहीं उतर पाईं। जून 2013 की आपदा के बाद विस्थापन की सूची में शामिल कबिल्ठा गांव का विस्थापन तो दूर भौगोलिक सर्वेक्षण तक नहीं हो पाया है। चिलौंड, ब्यूखी, स्यायूं, कुरझेठी, जाल तल्ला व मल्ला गांव यातायात सुविधा से वंचित हैं। ग्रामीणों को अपने घरों तक पहुंचने के लिए मीलों का सफर तय करना पड़ रहा है। घाटी के 13 गांवों के ग्रामीणों को प्राथमिक उपचार तक की सुविधा नहीं हैं। इस कारण उन्हें बुखार की दवा के लिए भी गुप्तकाशी की दौड़ लगानी होती है। कोटमा में वर्षों से हो रही राष्ट्रीयकृत बैंक शाखा खोलने की मांग होती आ रही है लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हो पाई है।
ग्राम पंचायत चौमासी के ग्राम प्रधान मुलायम सिंह तिंदोरी, ऊषा सती, सामाजिक कार्यकर्ता ओम प्रकाश भट्ट, संदीप भट्ट, ओपी भट्ट का कहना है कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी कालीमठ घाटी को जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं। बीते चार विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों ने वोट के लिए जनता से जो वादे किए उनमें एक प्रतिशत भी पूरे नहीं हो पाए। क्षेत्र को जोड़ने वाला गुप्तकाशी-कालीमठ-कोटमा-चौमासी मोटर मार्ग आपदा के बाद से बदहाल है। लोनिवि ने सुधारीकरण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए हैं लेकिन हल्की बारिश में सड़क बदहाल हो जाती है।
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12वीं की पढ़ाई के लिए 10 किमी की दौड़
13 गांवों के नौनिहाल इंटर की पढ़ाई के लिए जीआईसी कोटमा की दौड़ लगा रहे हैं। चौमासी, चिलौंड आदि गांवों के बच्चों को स्कूल आने के लिए 8 किमी एक तरफा दूरी तय करनी पड़ रही है। ब्यूखी, स्यासूं गांव के बच्चे 5 से 7 किमी पैदल चलकर स्कूल पहुंच रहे हैं।
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