ऋषिगंगा में ग्लेशियर फटने के बाद वहां झील बनने की संभावनाओं के बीच एक बार फिर जिले में मौजूद झील/ताल के गहराई व क्षेत्रफल नापने की मांग जोर पकड़ने लगे हैं। वर्ष 2002 से स्थानीय ग्रामीण व भू-विज्ञान से जुड़े लोग बधाधीताल, देवरियाताल व वासुकीताल की माप की मांग कर रहे हैं। लेकिन आज तक जिला प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं कर पाया है।
2013 की केदारनाथ आपदा का कारण चोराबाड़ी ताल को माना गया था। ताल फूटने से पानी व मलबे के सैलाब से केदारपुरी से गौरीकुंड, सोनप्रयाग से अगस्त्यमुनि तक व्यापक तबाही मचा दी थी। ऊखीमठ ब्लॉक के मंगोली गांव निवासी भू-विज्ञानी बलवीर सिंह धरम्वाण का कहना है कि वर्ष 2002 से प्रशासन से प्रधानमंत्री कार्यालय नई दिल्ली तक रुद्रप्रयाग क्षेत्र में हिमालय की तलहटी पर बधाणीताल, देवरियाताल व वासुकीताल की गहराई व क्षेत्रफल की माप की मांग होती आ रही है। लेकिन इस दिशा में कार्रवाई नहीं हो पाई है। इधर, अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के निदेशक डा. एपीएस बिष्ट व वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक डा. डीपी डोभाल ने बताया कि वासुकीताल, देवरियाताल व बधाणीताल की सतह मजबूत है। साथ ही इनसे आसपास के कई स्रोत भी रिचार्ज होते हैं। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी, रुद्रप्रयाग नंदन सिंह रजवार का कहना है कि देवरियाताल, वासुकीताल व बधाणीताल की गहराई व क्षेत्रफल की माप को लेकर बीएस धरम्वाण द्वारा एक पत्र दिया गया है, जिसके तहत जिला स्तर पर जरूरी कार्रवाई अमल में लाई जा रही है। ओएनजीसी समेत अन्य संबंधित कंपनियों से सीएसआर के तहत ताल-झीलों की माप के लिए बजट के बारे में जानकारी मांगी है, जिसमें कुछ प्रस्ताव भी मिले हैं। जल्द ही प्रस्तावों का अध्ययन कर ताल-झीलों की गहराई व माप के लिए टेंडर आमंत्रित किए जाएंगे।
बधाणीताल- फोटो : RUDRAPRYAG