चंद्रापुरी। पिछले साल केदारनाथ आपदा से मंदाकिनी नदी के किनारे बसे जो गांव सर्वाधिक प्रभावित हुए, उनमें नदी के दाईं ओर स्थित चंद्रापुरी गांव भी है। करीब 70 परिवारों वाले इस गांव के लोग बादलों की गड़गड़ाहट से कांप उठते हैं। एक वर्ष पूर्व उनकी आंखों ने जो तबाही का मंजर देखा था, वह उनके सामने फिर तैरने लगता है।
गांव में लोगों से बातचीत करने पर सरकार के दावों और जमीनी हकीकत का पता चलता है। सरकारी कार्यप्रणाली का इससे बेहतर नमूना नहीं मिल पाएगा कि जहां भूस्खलन से पाली गांव जाने वाला रास्ता टूट गया था, उसके नीचे सुरक्षा दीवार बनाने की जरूरत नहीं समझी गई। ऐसी स्थिति में लोगों को डर है कि नदी का प्रवाह बढ़ने पर कहीं पानी बस्ती की ओर रुख न कर दे। आपदा में जिन लोगों के घर-आंगन तबाह हो गए थे, उनके लिए 18 भवन एक एनजीओ ने बनाए हैं। विश्व बैंक की मदद से सरकार 68 परिवारों के लिए भवन बना रही है। जीआईसी चंद्रापुरी में पढ़ने वाली सोनिया बताती है कि स्कूल नदी के पार है। पैदल पुल पिछले साल बह गया था। लोनिवि की तरफ बनाया गया अस्थायी पुल ढह गया है। अब ग्रामीणों द्वारा बनाए गए कच्चे पुल से नदी पार करनी पड़ती है। नवनिर्वाचित क्षेत्र पंचायत सदस्य फुलदेई देवी कहती हैं कि नदी पार करने के लिए लोनिवि की तरफ से लगाई गई ट्राली खतरनाक हालात में हैं। सरकार ने जनरेटर से चलने वाली ट्राली लगाने की बात कही थी, लेकिन कब तक लगेगी यह कोई नहीं बता पा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता दर्शन सिंह बिष्ट और ओम प्रकाश बताते हैं कि लोनिवि द्वारा बनाए गए अस्थायी पुल को खोल दिया जाए, तो बरसात के बाद काम आ सकता है। लेकिन ग्रामीणों की सुनता कौन है।
गांव में अपनी आपबीती सुनाने काफी संख्या में लोग मौजूद हैं। 81 वर्षीय दयाराम सरकारी कार्यप्रणाली से खफा है। उनके पुश्तैनी भवन में पिछले साल बाढ़ का मलबा घुस गया था। वह कहते हैं कि राजस्व कर्मियों की मनमानी के कारण वह आपदा प्रभावित की श्रेणी में नहीं आ पाए। लगातार पत्राचार के कारण उनकी फाइल काफी मोटी हो गई है। वह उत्तेजित होकर कहते हैं कि मेरे मरने के बाद मेरी चिता पर यह यह फाइल जलेगी। गुड्डी देवी का कहना है कि चंद्रापुरी गांव के दक्षिणी छोर पर गडियारी गदेरा आता है। उससे बचाव के लिए चेकडैम नहीं बनाए गए।
वयोवृद्ध नारायण दत्त और गोपाल दत्त कहते हैं कि गांव के ऊपर जंगल में जमीन दरक रही है। इससे बस्ती को खतरा है। जब गांव वाले मलबे में दबेंगे, तभी शासन की नींद टूटेगी। सरकार ने कहा था कि पूरे गांव का विस्थापन होगा, लेकिन एक भी परिवार को अन्यंत्र जगह नहीं मिल पाएगी।
विस्थापन कहां होगा ओर इसकी रुपरेखा क्या होगी? इस पर गांव के युवक और महिलाएं तराई क्षेत्र विशेषकर देहरादून जिले की सीमा में जाने को तैयार हैं। गुड्डी देवी कहती हैं कि यहां बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था है और ना ही आने-जाने के रास्ते व पुल। कुल मिलाकर आपदा को एक साल गुजर गया है। चंद्रापुरी गांव की हालात में सुधार नहीं हो पाए हैं। आपदा के बाद शासन ने विस्थापन के सब्जबाग दिखाए, लेकिन कोई पहल नहीं की।