विनोद नौटियाल
ऊखीमठ। जिस पिता से सेना की वीरता के किस्से सुनकर मानवेंद्र ने सेना को चुना, आज उसी बेटे को ताबूत में तिरंगे में लिपटा देख रिटायर फौजी पिता की आंखें भी डबडबा गई, लेकिन शौर्य, पराक्रम की मिसाल पेश करने वाले बेटे की शहादत से सिर गर्व से ऊंचा भी हो गया। बोले, मौत तो एक दिन आनी है, लेकिन मेरे बेटे ने देश के लिए प्राण न्यौछावर किए हैं। मेरा खून देश के काम आया है। यह मेरे लिए गौरव की बात है।
13 जून की रात्रि को जम्मू-कश्मीर के बांदीपुरा में आतंकी मुठभेड़ में शहीद हुए मानवेंद्र के दर्शनों के लिए पूरी कालीमठ घाटी उमड़ पड़ी। अपने लाल को खोने का गम यहां के लोगों की आंखों से बहते आंसू बया कर रहे थे। शहीद के घर में पत्नी, मां और बहनें जहां मानवेंद्र के शव को देख बिलख-बिलख कर बेसुध हो गई। वहीं लकवे से ग्रसित पिता नरेंद्र सिंह भी अपने उबाल को रोक नहीं पाए और बेटे के शव से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े। फिर कुछ ही देर में स्वयं को संभालते हुए बोले, मुझे खुशी है, मेरा बेटा देश पर न्यौछावर हुआ है। चाचा दिलवर सिंह रावत कहते हैं, बेटे को गोदी में रखकर कभी गांव की गलियों में घूमा करता था और आज...। वहीं फफकते हुए छोटे भाई दिग्विजय ने बताया कि किस तरह बड़ा भाई उसका ध्यान रखता था। अपने वीर सैनिक को अंतिम विदाई देने के लिए काली गंगा के पैतृक घाट पर सेना के 138 जवान मौजूद थे, जिसमें 4 अधिकारी, 12 जेसीओ व 122 जवान थे। इधर, जिलाधिकारी मंगेश घिल्डियाल ने बताया कि शहीद परिवार की हरसंभव मदद की जाएगी।
मासूम बच्चों के सवाल का जवाब न दे सका कोई...
मानवेंद्र सिंह रावत का शव जैसे ही कविल्ठा गांव पहुंचा, तो परिजन व गांव के हर कोई बिलख उठा। इन सबसे अंजान शहीद का बेटा अनुराग व बेटी जान्हवी कुछ देर यह सब एकटक देखते रहे। कुछ ही देर में दादा के पास जाकर नन्हें बच्चों ने कहा मेरे पापा ऐसे क्यों लेटे हैं। बच्चे के इस सवाल से वहां मौजूद लोगों की आंखें भर आई, लेकिन मासूम को कोई जवाब नहंी दे पाया।