रुद्रप्रयाग। मध्य हिमालय में पाए जाने वाले औषधीय पौधे विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। ऐसे में उत्तराखंड के पांच पर्वतीय जनपदों में 15 औषधीय पौधों की खेती की जाएगी। हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल के उच्च शिखरीय शोध पादप केंद्र (हैप्रेक) की ओर से प्रारंभिक चरण में इस जिले के 50 काश्तकारों को चुना गया है। शनिवार को उन्हें औषधीय पादकों की 5000 पौध नि:शुल्क दी गई। उन्हें खेती के आधुनिक गुर भी सीखाए गए।
राष्ट्रीय मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज परियोजना के तहत हैप्रैक के वैज्ञानिकों के साथ बागेश्वर, उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली और रुद्रप्रयाग के 50 काश्तकारों ने मध्य हिमालय में स्थित चोपता, दुगलबिट्टा और बनियाकुंड के बुग्यालों का भ्रमण किया। यहां स्थापित प्रकृति विश्लेषण केंद्र में काश्तकारों को जड़ी-बूटी उत्पादन की जानकारी दी गई। वैज्ञानिक डा. विजयकांत पुरोहित व डा. बीएस मिंगवाल ने कहा कि इन जड़ी-बूटियों अतीस, कुटकी, चोरू आदि का संरक्षण नहीं किया गया तो ये जल्द विलुप्त हो जाएंगी। इन प्रजातियों को पर्वतीय क्षेत्रों में संरक्षित कर काश्तकार अपनी आर्थिकी भी मजबूत कर सकते हैं। दल को बनियाकुंड में स्थापित मौसम यंत्र के बारे में भी बताया गया। इसके बाद बुग्याल क्षेत्र में हिप्पोपी व खर्सू के सौ पौधों का रोपण भी किया गया। इस मौके पर जयदेव चौहान, प्रदीप डोभाल, राजेंद्र सिंह, जयवीर ङ्क्षसह, सब्बर सिंह, भगवान सिंह, खिलाप सिंह, कलावती देवी, मुन्नी देवी आदि थे।