अगस्त्यमुनि। दो सितंबर 1989 को सेना में भर्ती के दौरान ली गई कसम पर खरा उतरा है मेरा भाई। मेरे फतेह ने देश के लिए प्राण न्यौछावर कर हमारा मान बढ़ाया है। यह शब्द शहीद के बड़े भाई सते सिंह के हैं। कहना है कि मैने अपना भाई हीं नहीं एक अजीज दोस्त भी खो दिया है।
17 जून को नगालैंड में संदिग्ध नगा विद्रोहियों के हमले में शहीद हुए फतेह सिंह नेगी का पार्थिव शरीर मंगलवार को जब पैतृक गांव पहुंचा, तो पत्नी गीता देवी और बच्चों के साथ बड़ा भाई सते सिंह और उनकी पत्नी शव पर लिपटकर रो पड़े। शहीद के बड़े भाई सते सिंह स्वयं और अन्य सभी को भी ढाढ़स बंधाने की कोशिशें करते रहे। शहीद के बेटे रॉबिन ने कहा कि देश की सीमाओं पर हालात हर रोज खराब हो रहे हैं। हर रोज जवान शहीद हो रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार कुछ नहीं कर रही है। बताया कि दो दिन पहले ही पिता से बात हुई थी, जिसमें उन्होंने कहा कि समय पर किया गया कठिन परिश्रम जीवन में हमेशा काम आता है।
घाट का दिया किराया
40-असम रायफल के हवलदार शहीद फतेह सिंह का अंतिम संस्कार चंद्रापुरी में मंदाकिनी नदी के घाट पर किया गया। यह घाट उनका पैतृक नहीं था, इसलिए परिजनों ने अंत्येष्टि से पूर्व वहां का किराया दिया। इधर, शहीद के सम्मान में चंद्रापुरी व्यापार संघ ने भी बाजार बंद रखा।
क्यूंजा घाटी के तीसरे शहीद फतेह सिंह
विकासखंड के क्यूंजा घाटी वीरों की भूमि है। यहां कई सैनिक बाहुल्य गांव हैं। बीते दो दशकों में यहां के तीन जवान मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे चुके हैं। वर्ष 1999 में बेंजी-कांडई गांव के नायक सुनील दत्त कांडपाल कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे, जबकि वर्ष 2008 में तेवड़ी गांव के रजपाल सिंह ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। वहीं, 17 जून 2018 को बाड़व मल्ला गांव के फतेह सिंह नेगी शहीद हुए हैं।