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Roorkee News: जिले में चार लाख पशु फिर भी दूध के उत्पादन में आई गिरावट

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जिले में इस बार बीते वर्ष की तुलना में दूध के उत्पादन में गिरावट आई है। सरकारी डेयरी में लोग दूध देने नहीं जा रहे हैं। इससे लगातार जिले में दुग्ध उत्पादन में गिरावट देखी जा रही है। बीते वर्ष जहां हरिद्वार दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड को 16 हजार लीटर के करीब दूध मिल रहा था, वहीं अब 11 हजार लीटर दूध ही मिल पा रहा है।

रुड़की के लंढौरा स्थित शिकारपुर में हरिद्वार दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड है। जिले में बीते वर्ष तक 16 हजार लीटर से अधिक दूध की सप्लाई होती थी। अब यहां प्रतिदिन के हिसाब से केवल 11089 लीटर दूध ही सप्लाई हो रहा है। जबकि जिले में इस संघ से 305 डेयरी संस्थाएं जुड़ी हैं, जो गांव-गांव से दूध एकत्र कर यहां सप्लाई करती हैं। इस कार्य के लिए 11778 लोग जुड़े हुए हैं।
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अब जिले में कई डेयरी ऐसी भी जो आसपास गांव से दूध एकत्र कर खुद ही अपने निजी स्तर से बेच रहे हैं। जबकि कई लोगों ने खुद की डेयरी खोली है। ऐसे में जिले में विभागीय आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष दूध की कमी है। यही नहीं, खास बात तो यह है कि 2022 में दूध का उत्पादन जहां 25 हजार लीटर प्रतिदिन था, वह महज दो साल में गिरकर 11 हजार लीटर प्रतिदिन पर पहुंच गया है। जबकि जिले में सबसे अधिक चार लाख के करीब पशु हैं।



शहर से देहात तक घी के दाम 900 रुपये प्रति किलो

जिले में शहर से खरीदे या ग्रामीण इलाकों में, अगर घर का शुद्ध देसी घी चाहिए तो 900 रुपये प्रति किलोग्राम से एक हजार रुपये तक मिलेगा। यह घी गाय और भैंस का मिलेगा। ऐसे में लोग अब दूध की मलाई और छाछ के बाद निकले मक्खन से घी बना रहे हैं। इससे उन्हें अधिक लाभ पहुंच रहा है। जबकि लोग घरों में जो दुग्ध उत्पादन कर रहे हैं, उसे सरकारी डेयरी को न देकर निजी स्तर पर ही बेच रहे हैं। संघ को दूध देने में उन्हें अधिक मुनाफा नहीं मिल रहा है। इसके चलते उन्होंने बाहरी लोगों को दूध बेचना शुरू किया है। इससे भी जिले में दूध के उत्पादन में कमी आई है।

चार लाख रजिस्टर्ड गाय और भैंस हैं जिले में



कृषि बाहुल्य हरिद्वार जिले में खेती के अलावा पशुपालन भी बड़े पैमाने पर होता है। इस समय गाय, भैंस, बैल आदि की संख्या 4.5 लाख है। इनमें दो लीटर से 30 लीटर तक दूध देने वाले गाय और भैंस भी शामिल हैं। पशु पालन विभाग हरिद्वार की माने तो दुधारू पशुओं से अधिकांश लोग खुद ही डेयरी का संचालन कर रहे हैं।

कोरोना के बाद डेयरी को देना बंद किया दूध

कोरोना काल के दौरान हजारों लोग बेरोजगार हो गए थे। इसके बाद लोगों ने स्वरोजगार शुरू किया था। इसमें पशुपालन कर दुग्ध उत्पादन मुख्य स्रोत में से एक था। सैकड़ों लोगों ने विभिन्न योजनाओं के तहत जानवरों के लिए लोन लिया, और अच्छे खरीदकर दुग्ध उत्पादन किया। अब यहां लोगों ने खुद ही डेयरी खोल दी, या फिर बाइक पर केन में दूध भरकर घर-घर पहुंचाने लगे। इससे उन्हें अच्छा मुनाफा हुआ। जबकि डेयरी से उन्हें विभिन्न योजनाएं मिलने के बाद भी उन्होंने खुद ही दूध बेचना शुरू किया।
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जिले में पिछले साल की तुलना में दूध उत्पादन में करीब पांच लीटर की गिरावट आई है। निजी स्तर पर इसकी क्या स्थिति है यह कहना संभव नहीं है। हालांकि दुग्ध संघ में पिछले वर्ष जहां 16 हजार लीटर के करीब दूध आ रहा था, वहां अब 11 हजार लीटर के करीब ही दूध आ रहा है। - दिनेश सैनी, डेयरी इंचार्ज, दुग्ध संघ
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