श्री दिगंबर जैन समाज में चल रहे दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन शुक्रवार को उत्तम आर्जव धर्म की विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस पावन अवसर पर समाज के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और धर्म लाभ प्राप्त किया। पूजा के दौरान छल-कपट छोड़ने का संदेश दिया गया।
उत्तम आर्जव धर्म के अवसर पर अनुज जैन ने सौधर्म इंद्र बनकर भगवान का अभिषेक किया। वहीं, शांतिधारा का सौभाग्य अजय जैन को प्राप्त हुआ। कार्यक्रम के दौरान बाहर से पधारे पंडित ने जैन मुनियों के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि धर्म का सच्चा स्वरूप जैन संतों में देखने को मिलता है।
दिगंबर संत जीवन में कभी रुपये-पैसे को हाथ तक नहीं लगाते और समस्त सांसारिक वस्तुओं का पूर्ण त्याग करते हैं। कार्यक्रम में कविवर द्यानतराय की ओर से रचित पूजन पंक्तियों “मन में हो सो वचन उचरिये, वचन होय सो तन सों करिये...” पर विशेष प्रकाश डाला गया। पंडित ने बताया कि छल-कपट और बेईमानी से कमाया गया धन किसी भी प्राणी के काम नहीं आता बल्कि यह सिर्फ दुख लेकर आता है।
उन्होंने सभी से अपने धन का सदुपयोग जरूरतमंदों और दूसरों की भलाई के लिए करने का आह्वान किया। दिनभर चले धार्मिक आयोजनों के बाद संध्या बेला में अदिति जैन की ओर से मंगल आरती की गई। इस अवसर पर अरिहंत जैन, पंकज जैन, अजय, राजेश, गौरव, श्रेयांस जैन, अमित, प्रक्षाल, उत्कर्ष, शशांक, अखिल, और सम्यक जैन सहित बड़ी संख्या में समाज के गणमान्य लोग उपस्थित रहे।