सरकारी विभागों की लचर कार्यप्रणाली और लेटलतीफी से एक मासूम जिंदगी से हार गई। ब्लड कैंसर से पीड़ित जिस मासूम के उपचार को शासन ने राहत राशि भेजी वह परिजनों को मौत के पांच माह बाद मिली।
शास्त्री नगर निवासी नीतू सिंह के पांच साल के बेटे तेजस की तबियत खराब होने पर डाक्टरों ने उसके टेस्ट करवाए थे। उसमें ब्लड कैंसर की पुष्टि हुई। तलाकशुदा नीतू अपने मां-बाप के साथ किराए के मकान में रहती है। कंपनी में काम करके वह पूरे परिवार का पालन पोषण करती है। ऐसे में अपने बच्चे का उपचार कराना उसके लिए आसान नहीं था। नवंबर-2015 में उसने मुख्यमंत्री राहत कोष से आर्थिक मदद के लिए गुहार लगाई थी। लेकिन राहत राशि नहीं मिली।
फिर भी नीतू उधार में रुपये लेकर बच्चे का उपचार जौलीग्रांट और इलाहाबाद के अस्पतालों करवाती रही। लेकिन वह अपने बेटे को बचा नहीं पाई और 28 जनवरी 2016 को तेजस की मौत हो गई। मार्च-2016 में उनके पास मुख्यमंत्री राहत कोष से उपचार के लिए 50 हजार रुपये का चेक आया। नीतू ने बताया कि चेक को उसने शास्त्रीनगर स्थित एक बैंक में जमा कराया था। लेकिन 15 दिन बाद भी जब खाते में रुपये नहीं आए तो उसने शाखा संचालक से पूछा।
उन्होंने बताया ऐसे चेक क्लीयर होने में समय लगता है। वह लगातार चेक के संबंध में जानकारी लेती रही। लेकिन खाते में रुपये नहीं आए। थक-हार कर उसने नगर निगम मेयर को इससे अवगत कराया। साथ ही गंगनहर कोतवाली में भी तहरीर दी। मंगलवार को उसे 50,000 रुपये मिले। नीतू ने बताया इस राशि से वह उधार चुकाएगी। लेकिन मलाल यह है कि यदि समय से मदद मिलती तो वह बच्चे का बेहतर ढंग से उपचार करवाती। तब हो सकता था कि बेटा बच जाता।