मंगलौर। मोहर्रम के मौके पर नगर और देहात क्षेत्र के विभिन्न इमामबाड़ों में अजादारों ने मजलिसों का आयोजन कर हजरत इमाम हुसैन को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। मजलिसों में उलेमा हजरात ने हजरत इमाम हुसैन द्वारा करबला में दी गई कुर्बानी पर प्रकाश डाला। बनारस से पधारे मौलाना तफसीर आबदी ने कहा कि विश्वभर में आज इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैला हुआ है। जबकि हकीकत यह है कि इस्लाम कभी किसी बेगुनाह को मारने की अनुमति नहीं देता। बाद में नोहा ख्वानी एवं सीना जनी की गई। जिसमें हजारों लोगों ने भाग लिया।
बीती रात मोहर्रम की पहली तारीख पर नगर व देहात क्षेत्र के सभी इमामबाड़ों में मजलिसों का आयोजन किया गया। मजलिसों में भारी संख्या में लोगों ने भाग लेकर नवासा-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। स्थानीय मोहल्ला पठानपुरा स्थित दरबारे हुसैन में मजलिस को बनारस उत्तर प्रदेश से पधारे मौलाना तफसीर आबदी ने हजरत इमाम हुसैन की जीवन और उनकी शहादत का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि करबला में इमाम हुसैन किसी जंग के लिए नहीं गए थे। बल्कि मकसद-ए-इमाम हुसैन यह था कि खुदा का दीन बच जाए इंसानियत कयामत तक की जिंदगी अता हो। यही सब इमाम हुसैन ने करबला में करके दिखाया। दुनिया को बताया कि हक और बालित में क्या फर्क है। उन्होंने कहा कि विश्वभर में आज इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैला हुआ है। जबकि हकीकत यह है कि इस्लाम कभी किसी बेगुनाह को मारने की अनुमति नहीं देता।
इस्लाम केवल भाईचारा, इत्तेहाद व सभी धर्मों के सम्मान का हुक्म देता है। महिलाओं, बच्चों के लिए इस्लाम खासतौर से कहता है कि इनकी इज्जत व सम्मान में किसी प्रकार की कमी न की जाए। लेकिन जो लोग इस्लाम की आड़ में बेगुनाह की हत्या कर रहे हैं। वह कभी इस्लाम के पैरोकार नहीं हो सकते। बारगाहें बाबुल मुराद में मौलाना सैय्यद अजहर अब्बास नकवी ने मजलिस को खिताब फरमाया। बारगाहें जैनबयां, बड़ा इमामबाड़ा सहित मौहल्ला हल्का स्थित दोनों इमामबाड़ों मौहल्ला बंदरटोल, क्षेत्रीय ग्राम टांडा भन्हेड़ा व जैनपुर झंझेड़ी और लंढौरा में भी इमामबाड़ों में अजादारों ने मजलिसों का आयोजन कर हजरत इमाम हुसैन को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। मजलिसों के बाद नोहा ख्वानी व सीना जनी की गई नोहा ख्वानों में मौहम्मद हुसैन, वफा आबदी, जौहर अब्बास, विशाल नकवी, वाहिद आरफी, शमीम आरफी, रिहान हैदर, नूर मौहम्मद, नसीम हैदर, दानिश जैदी, इरफान जैदी, कौशर अब्बास शामिल रहे। मजलिसों की व्यवस्थाएं इतरत हुसैन उर्फ हब्बू, रजब अली आरफी, मजाहिर हुसैन, युसूफ हुसैन, अली मेंहदी आदि ने संभाली।