रुड़की। पिरान कलियर में बार-बार बांग्लादेशी नागरिक पकड़ में आने के पीछे कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। पड़ताल में सामने आया है कि तीन दिन पहले पकड़ा गया आरोपी अप्रत्यक्ष रूप से दरगाह का कार्य कर रहा था। जबकि एक बांग्लादेशी नागरिक ने तो कई साल तक बतौर दरगाह कर्मचारी काम भी किया। पिछले साल ही उसकी मौत हुई। इस समय भी दरगाह कर्मचारियों की बड़ी संख्या ऐसी है, जिनके असल नाम पतों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।
अन्य धार्मिक स्थलों की तरह पिरान कलियर में बाहरी लोगों की आवाजाही साल भर बनी रहती है। लेकिन पिछले कुछ सालों में बांग्लादेशी नागरिक पकड़े जाने के कई मामले सामने आने से तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं। खुफिया विभाग खुद कुबूल कर रहा है कि तीन दिन पहले पकड़ा गया बांग्लादेशी नागरिक तीसरी बार भारत आया था। यह भी पता चला कि दरगाह के एक कब्रिस्तान की देखरेख से जुड़ा था। हालांकि उसका नाम सीधे तौर पर कर्मचारी के रूप में दर्ज नहीं था। मगर कुछ साल पहले एक और बांग्लादेशी के कलियर आकर बतौर दरगाह कर्मचारी काम करने की बात सामने आई है। उसके मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि दस्तावेज बनने के बाद पिछले साल उसकी मौत हुई है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि बांग्लादेशी होने की सच्चाई आम होने के बावजूद उसे काम पर कैसे रखा गया।
इससे भी अहम सवाल ये है कि खुफिया विभाग उसे पहचानने में गच्चा कैसे खा गया। उसका पहचान पत्र पासपोर्ट कैसे बना दिया गया। सच तो ये है कि बांग्लादेशियों के अलावा दरगाह कर्मचारियों की लिस्ट में ऐसे तमाम नाम हैं, जो अलग अलग प्रदेशों से बिना सत्यापन कलियर में सालों से रहते आ रहे हैं। इनका पिछला कोई रिकॉर्ड दरगाह प्रबंधन, पुलिस या खुफिया विभाग के पास नहीं हैं। झुग्गी बस्तियों के अलावा बाहरी प्रदेशों के कर्मचारियों की कुंडली खंगाली जाए तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।
दरगाह की व्यवस्थाओं में सीधा दखल
अनजान लोग कलियर में न सिर्फ शरण ले रहे हैं, बल्कि दरगाह की व्यवस्थाओं तक भी उनका सीधा दखल रहता है। कर्मचारी होने का ठप्पा नहीं भी होने के बावजूद दरगाह परिसर में जायरीनों से जुड़ी तमाम व्यवस्थाओं में वह बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं। मुफ्त में कर्मचारी मिलने पर दरगाह प्रबंधन इस पर चुप्पी साधे रहता है, मगर सुरक्षा के लिहाज से ये दरियादिली भारी पड़ सकती है।