चुनावी जमीन पर प्रत्याशी बहादुर योद्धा की तरह लड़ता है। पूरी रात एक पल का भी आराम नहीं मिलता, थकान के बावजूद आंखें सोने के लिए नहीं कहती, क्योंकि कत्ल की रात जो है। यह भी भलीभांति पता है कि भोर होने के बाद तो मोहर लगने की औपचारिकता ही है, बिसात के लिए तो यह रात ही काफी है। कुछ इसी तरह का हाल शहर सहित विभिन्न गांवों में प्रत्याशियों और उनके खासमखास समर्थकों का रहा।
चुनाव से पहले आखिरी रात में कई बार पूरी बाजी पलट जाती है। जीत रहे प्रत्याशी को अफवाहें बहा ले जाती हैं और हार रहे प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की जाती है। इसी के चलते चुनाव से पहले की रात को आम भाषा में कत्ल की रात भी कहा जाता है। मंगलवार की रात को भी प्रत्याशी और उनके खास समर्थकों की रात आंखों में जागकर कटी। मुखबिरों की सूचना पर पूरी रात प्रत्याशी दौड़ते रहे। पता ही नहीं चला कब सुबह हो गई। मंगलवार की रात जब लोग गांवों में घरों के भीतर गहरी नींद में सो रहे थे तो समर्थक गाड़ियों से गली-गली नाप रहे थे। इस दौरान गुप्तचरों से मिल रही सूचनाओं और अफवाहों ने इनकी दौड़ को और भी तेज कर दिया। हर अफवाह पर गावों के मुअज्जिजों से तस्दीक की जा रही थी और वोटों को न टूटने देने का वायदा भी लिया जा रहा था। सबसे बड़ी चुनौती थी लोटे में नमक की, क्योंकि कई गावों में अभी बिरादरी की बिरादरी लोटे में नमक डालकर यानी कसम खाकर एक रुख तय करती है, इसे लेकर भाजपा, बसपा, कांग्रेस पार्टी के दिग्गजों ने रात भर गावों की विभिन्न बिरादरी के लंबरदारों पर नजरें गड़ाई रखी।