रुड़की। पर्यावरण में घुल रहा सल्फर का जहर खतरनाक है और इसे रोकना सरकारों के लिए चुनौती है। स्थिति यह है कि पेट्रोलियम उत्पादों से निकलने वाले सल्फर की न्यूनतम मात्रा 50 मिलीग्राम प्रति लीटर है, जबकि केंद्र सरकार की ओर से वर्ष 2020 तक इसे 10 मिलीग्राम प्रति लीटर करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत ही आईआईटी रुड़की में केेंद्र और राज्य पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की ओर से तीन दिनी वर्कशाप आयोजित की गई है, जिसमें पेट्रोलियम पॉल्यूशन की चुनौतियों पर मंथन किया जा रहा है।
वर्कशाप के दूसरे दिन शुक्रवार को वक्ताओं ने बढ़ते पेट्रोलियम उत्पादों और इससे पर्यावरण पर खतरे को लेकर चिंता जताई। उन्होंने पेट्रोलियम और पेट्रो केमिकल इंड्रस्ट्री में नई तकनीकों के उपयोग पर जोर दिया, जिससे पर्यावरण में घुलते सल्फर के जहर को कम से कम किया जा सके। उन्होंने कहा कि पेट्रोलियम पदार्थों का उपयोग आज समाज की आवश्यकता बन चुका है। ऐसे में इससे होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना भी आवश्यक है। वर्कशाप के कोर्डिनेटर डा. वीसी श्रीवास्तव ने कहा कि रिफाइनरियों के लिए प्रदूषण के मानक लगातार कठोर किए जा रहे हैें, जिससे पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सके। उन्होंने नई तकनीकों के जरिए भी पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया। इससे पहले यूपीईएस देहरादून से आए डा. आईडी मल्ल ने वर्कशाप का शुभारंभ किया। इस मौके पर सेंट्रल पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के डायरेक्टर एने वर्मा, एमक्यू अंसारी, डा. संजय, जेके जोशी आदि उपस्थित थे।