आईआईटी वैज्ञानिक और उनके अधिवक्ता बेटे ने मिलकर सॉफ्टवेयर आधारित एक ऐसा वेब पोर्टल तैयार किया है जो किसी भी इंसान के साथ घटित आपराधिक घटनाओं के तहत उस पर लगने वाली कानूनी धाराओं की सटीक जानकारी देगा। ऐसे में पुलिस की ओर से यदि कम या ज्यादा अथवा गलत धाराएं लगाई गई हैं तो आप साफ्टवेयर की मदद से इसका पता लगा सकेंगे। इससे पुलिस से लेकर अदालत तक न्याय की राह आसान हो सकेगी। अब तक सबसे एडवांस तकनीक से तैयार साफ्टवेयर की मदद से जल्द वेब पोर्टल लांच करने की तैयारी है।
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिक प्रो. कमल जैन और उनके नेत्रहीन बेटे अर्पित जैन ने कानून को रोशनी दिखाने की ठानी और एक साफ्टवेयर बेस्ड वेब पोर्टल तैयार किया। यह पोर्टल आपराधिक घटनाओं के चलते लगने वाली धाराओं के बारे में सटीक जानकारी देता है। अर्पित ने दिल्ली के नामचीन इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट से कानून की पढ़ाई में पोस्ट ग्रेजुएट किया है। आंखों की रोशनी न होने के बावजूद अपने वैज्ञानिक पिता और मां के सहयोग से अर्पित ने सभी कक्षाओं की पढ़ाई उच्च श्रेणी में पास की। अर्पित ने बताया कि बचपन से उनकी इच्छा आम आदमी के लिए कंप्यूटर साफ्टवेयर के जरिए कानून की जानकारी देना था। जिसे उन्होंने अपने पिता के सहयोग से पूरा कर लिया है। साफ्टवेयर आधारित इस वेब पोर्टल को वर्चुअल एडवोकेट डॉट इन नाम दिया गया है। जल्द इसे आम आदमी के उपयोग के लिए लांच किया जाएगा। उकसे बाद बिना किसी खर्च के लोग कानून की सहायता ले सकेंगे।
काग्नेटिव साइंस से साफ्टवेयर समझेगा अर्थ
वैज्ञानिक प्रो. कमल जैन ने बताया कि काग्नेटिव साइंस, कंप्यूटर साइंस में सबसे एडवांस तकनीक है। यह साफ्टवेयर में इस तरह की एप्लीकेशन सुचारु करता है कि वह आपकी भाषा को समझकर अर्थ जुटा सके। यानी पोर्टल पर आपने साधारण भाषा में अपने साथ घटित घटना को भले घुमा फिराकर लिखा हो, लेकिन साफ्टवेयर काग्नेटिव साइंस आधारित तकनीक के जरिए उसका सटीक अर्थ ढूंढेगा और आपको जवाब देगा कि कौन सी आपराधिक धाराएं मुजरिम पर लगेंगी। उनके अनुसार कानून की दुनिया में देश में यह पहली तरह का प्रयोग है।
अदालतों, वकीलों और पुलिस का समय बचेगा
वेब पोर्टल तैयार करने वाले अर्पित का कहना है कि आमतौर पर देखा जाता है कि घटनाओं के बाबत तहरीर में लिखी शिकायत में दिए तथ्यों के आधार पर पुलिस और वकील को धाराओं को ढूंढने और लगाने में खासी माथापच्ची करनी पड़ती है। कई बार धारा गलत हो जाती है तो अदालत में विरोधी पक्ष उसे चुनौती देता है, जिसे बाद में संशोधित करना पड़ता है। यदि शुरू में वेब पोर्टल पर सटीक धाराओं की जानकारी मिल जाए तो बाद में धाराओं के बदलने और जिरह में जाया होने वाले वक्त से बचा सकता है।