साहित्यिक पत्रिका ‘नारी अस्मिता’ के जून, जुलाई और अगस्त के कहानी विशेषांक का ऑनलाइन विमोचन किया गया। इस दौरान आयोजित परिचर्चा में देश-विदेश से जुड़े साहित्यकारों और रचनाकारों ने हिस्सा लिया। करीब तीन घंटे तक चली चर्चा में कहानियों के कथ्य, स्त्री विमर्श, महिला सशक्तीकरण और समाज में महिलाओं की भूमिका पर विचार रखे गए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता गीतांजलि चटर्जी ने की। मुख्य अतिथि डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ और डॉ. इंदु झुनझुनवाला रहीं। संचालन पत्रिका की संपादक अर्चना त्यागी ने किया, जबकि तुलिका श्री ने सहयोग किया। कार्यक्रम की शुरुआत तुलिका श्री की सरस्वती वंदना से हुई। इसके बाद मोबाइल स्क्रीन पर कहानी विशेषांक के आवरण का अनावरण किया गया।
तुलिका श्री ने पत्रिका की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ‘नारी अस्मिता’ वर्ष 1994 से प्रकाशित हो रही है और देश के साथ विदेशों में भी अपनी पहचान बना चुकी है। प्रधान संपादक रचना निगम ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया।
परिचर्चा में मनवीन कौर ने ‘उम्मीद’, ‘मोहभंग’ और ‘भोर का उजाला’ कहानियों की समीक्षा की। उर्मिला पचिसिया ने ‘होंठों पर हंसी, आंखों में पानी’, ‘वीरांगना’ और ‘तुम सक्षम हो माही’ पर विचार रखे। बसंती पवार ने ‘भूल’, ‘शक’ और ‘मुंह दिखाई’ की समीक्षा की।
रश्मि मेहता ने ‘तुरपाई’, ‘सुहागन’ और ‘समंदर मंथन’ पर चर्चा की। डॉ. कमल प्रभा कपानी ने ‘कैक्टस के फूल’, ‘उस क्षण की परछाई’ और ‘अभिशप्त मैं नहीं तुम’ कहानियों के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा।
डॉ. इंदु झुनझुनवाला ने स्त्री विमर्श और सशक्तीकरण पर विचार रखे। कलाकार सुमिता नरवाल ने अपने रचनात्मक सफर को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने कहानियों को रेखाचित्रों से सजाने के साथ उनकी समीक्षा भी की है। हिंदी लेखक परिवार के लिए कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग भी की जा रही है। डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ ने रचनाकारों को शुभकामनाएं दीं। अध्यक्ष गीतांजलि चटर्जी ने सभी का आभार जताते हुए कहा, ‘पुरुष बलशाली हो सकता है मगर स्त्री शक्तिशाली है।’ उन्होंने महिलाओं से अपनी क्षमताओं को पहचानकर समाज की अग्रिम पंक्ति में आने का आह्वान किया।