रुड़की। बेटों ने जब दूसरी जाति की लड़की के साथ प्रेम विवाह करने का प्रस्ताव परिजनों के सामने रखा होगा तब भले ही भूचाल उठा हो, लेकिन अब इन्हीं बेटियों ने इन परिवारों के लिए प्रधान का चुनाव लड़ने का रास्ता खोल दिया। जबकि आरक्षण के चलते सामान्य जाति के यह परिवार चुनाव नहीं लड़ सकते थे।
इस बार वर्ष 2011 की जनसंख्या और प्रधान के आरक्षण के लिए लागू हुए तीसरे चक्र ने कई गांवों में बहुसंख्यक लोगों झटका देने का काम किया है। सामान्य जाति का बहुमत होने के बाद भी प्रधान का पद आरक्षित हो गया था। ऐसे में सामान्य जाति की महिलाएं चुनाव नहीं लड़ सकती थी। लेकिन कई गांवों में ऐसे सामान्य जाति के परिवार हैं जिनकी बहू आरक्षित जाति की हैं। इसलिए सामान्य जाति के लोगों को भी चुनाव लड़ने का मौका मिल गया है। प्रधान का पद आरक्षण होने के चलते पंचायत की राजनीति के दिग्गज तो मैदान से किनारे हो गए, लेकिन प्रेम विवाह करके आए बहूओं ने गांव के सीधे साधे परिवारों को भी राजनीति करने का मौका दे दिया। गांव लिब्बरहेड़ी में प्रधान का पद एससी जाति के लिए आरक्षित है। जिससे जाट बिरादरी एवं ओबीसी के उमेश कुमार के साथ 2008 में टिहरी जिले से शादी करके आई एससी जाति की रेखा को ससुराल के लोग चुनाव लड़ा रहे हैं। गांव नगला इमरती में यूपी के गाजीपुर क्षेत्र से 2003 में शादी करके आई एससी वर्ग की महिला मुस्कान गांव की सीट एससी होने पर चुनाव लड़ रही हैं। हालांकि उनके पति रिसाकत की वर्ष 2007 में मौत हो चुकी थी, लेकिन परिवार एवं देवर उनके चुनाव की बागडोर संभाले हुए हैं। चुड़ियाला गांव की सीट इस बार ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हुई है, लेकिन तीन साल पहले सामान्य श्रेणी के त्यागी समाज के योगेंद्र त्यागी के साथ सात फेरे लेकर आई यूपी के अलीगढ़ की रेखा को परिवार के लोगों ने चुनावी मैदान में उतार दिया है। मेहवड़ खुर्द उर्फ नागल में एससी के लिए आरक्षित हुई सीट पर सैनी समाज के ओबीसी श्रेणी के युवक अमित कुमार साथ शादी के बंधन में बंधकर आई संजो ने परिवार के लोगों को प्रधानी का चुनाव लड़ने के लिए आरक्षण को मात देकर चुनावी समर में उतरने का अवसर दे दिया है। इसके अलावा भी कई ऐसे में मामले सामने आ रहे हैं।
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असल में महिला की जाति उसके मायके की मानी जाती है, इसलिए आरक्षण के दौरान महिला की ओर से मायके से लगाए गए जाति प्रमाणपत्र पर आरक्षण का लाभ भी दिया जाता है। इसमें पति के जात से महिला का कोई किसी प्रकार का मतलब नहीं रहता है। ऐसे में अगर कोई दूसरे वर्ग के साथ विवाह बंधन में बंधी महिला चुनाव लड़ रही तो यह कानूनी रूप से बिल्कुल सही है।
- सोनिका, उपजिला निर्वाचन अधिकारी, हरिद्वार