विधानसभा चुनाव में मतदान के बाद रुझानों का आकलन करने में खुफिया एजेंसियां भी फेल साबित हो रही है। ऐेसे में उच्चाधिकारियों को रिपोर्ट भेजने में भी कर्मियों के पसीने छूट रहे हैं। कर्मियों के अनुसार इस बार वोटर पर्चियां घर पहुंचने और मोबाइल ऐप के कारण माथापच्ची के बाद भी सीटों पर हार जीत का अनुमान लगाना मुश्किल साबित हो रहा है।
पहले चुनावों में प्रत्याशियों के बस्ते देखकर मतदान का रुझान लगाया जाता था, लेकिन उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में पहली बार अधिकांश मतदाताओं की पर्चियां उनके घर पहुंचा दी गई। इसमें क्षेत्र के सभी बीएलओ की ड्यूटी लगाई गई थी। इसके अलावा चुनाव आयोग की साइट पर मोबाइल ऐप में भी मतदाताओं का मतदेय स्थल दर्शाया गया था, जिसका बड़ी संख्या में लोगों ने प्रयोग भी किया। ऐसे में उन्हें पर्चियों की भी आवश्यकता नहीं पड़ी। सीधे बूथों पर जाकर निर्धारित स्थल पर उन्होंने मतदान किया। इससे अधिकांश प्रत्याशियों के बस्ते खाली नजर आए।
मतदाताओं ने चुपचाप अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को मतदान किया। ऐसे में अब प्रत्याशी और समर्थकों के साथ ही खुफिया विभाग को भी जीत-हार का रुझान बताने में पसीने छूट रहे हैं। यही कारण है कि फिलहाल उत्तराखंड की अधिकांश सीटों पर कांटे की टक्कर बताई जा रही है। भले ही प्रत्याशियों और समर्थकों की ओर से जीत के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन अंदरखाने उनके माथे पर शिकन साफ नजर आ रही है। मशक्कत के बाद भी लोग मतदाताओं का मूड भांपने में नाकाम साबित हो रहे हैं। अब 11 मार्च को होनी वाली मतगणना से ही मतदान की हकीकत सामने आ सकेगी।