अर्जुन अवार्ड, यश भारती पुरस्कार और रुस्तम-ए-हिंद से सम्मानित अंतरराष्ट्रीय पहलवान सुभाष वर्मा को पहलवानी विरासत में मिली और इसे वह आगे भी बढ़ाना चाहते हैं। यही कारण है कि अपने तीनों बेटों को वह पहलवान बनाना चाहते हैं। महिलाओं की पहलवानी के संबंध में पूछने पर उन्होंने कहा कि अगर मेरी बेटी होती तो उसे पहलवान बनाता।
मदरहुड विवि में दो दिनी स्पोर्टस मीट के शुभारंभ के दौरान उन्होंने अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहा कि अन्य क्षेत्रों के साथ ही आज बेटियां कुश्ती में भी झंडे गाड़ रही हैं। ओलंपिक-2016 में साक्षी मलिक ने 58 किलोग्राम भारवर्ग में पदक जीतकर भारत में कुश्ती को आगे बढ़ाया है। इसके अलावा भी देश की कई बेटियों ने कुश्ती में देश का नाम ऊंचा किया है। उन्होंने बताया कि उनके पिता भी एक पहलवान थे, जिनकी प्रेरणा से दस साल की उम्र में ही उन्होंने कुश्ती का प्रशिक्षण लेने के लिए दिल्ली का रुख किया। जहां गुरु हनुमान अखाड़े में कुश्ती के गुर सीखे। इसके बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 40 से अधिक पदक जीते।
इसी कारण उन्हें खेल के सर्वोच्च पुरस्कार अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा रुस्तम-ए-हिंद और 11 साल तक सरहद केसरी के खिताब से नवाजा गया। कामनवेल्थ में भी उन्होंने कुश्ती के कई पदक जीते, लेकिन ओलंपिक में दो बार प्रतिभाग करने के बावजूद पदक नहीं जीत पाने का मलाल है। आज के समय में भारत में कुश्ती का स्थान पूछने पर उन्होंने कहा कि हाल ही में ब्राजील में हुए ओलंपिक-2016 में साक्षी मलिक की ओर से कुश्ती में पदक जीतने के बाद कुश्ती के प्रति लोगों को नजरिया बदला है। इसमें दंगल फिल्म ने भी काफी भूमिका निभाई है। अगर उनकी भी बेटी होती तो उसे वह पहलवान ही बनाते। अब पहलवानी के प्रति लोगों का नजरिया बदला है। पहले इसे बदमाशों का खेल माना जाता था, लेकिन अब इसके प्रति पुरुषों के साथ ही महिलाओं का भी रुझान बढ़ रहा है जो भारत में कुश्ती के लिए अच्छे संकेत हैं।
बेटे करेंगे सपना पूरा
अंतरराष्ट्रीय पहलवान सुभाष वर्मा का कहना है कि जो मैं नहीं कर सका उम्मीद है कि उसे बेटे पूरा करेंगे। उन्होंने बताया कि उनके तीन बेटे हैं और तीनों ही पहलवानी के गुर सीख रहे हैं। बड़ा बेटा 16 साल का है। बेटी न होने पर उन्होंने मलाल जताया। इस दौरान उन से जब खली और दारा सिंह के संबंध में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सरकारी प्रोत्साहन और अभाव में आज कई काबिल पहलवान बहुत पीछे छूट गए हैं, जबकि खली और दारा सिंह को फिल्मों और मीडिया ने हीरो बनाया है।