वहीं, सर्दियों की बारिश का योगदान 10 और मानसून से पहले होने वाली बारिश का आठ प्रतिशत है। दूसरा अध्ययन चट्टानों की बनावट, मौसमी बदलाव और मानवीय गतिविधियों के पानी की रासायनिक गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभावों पर आधारित रहा। दोनों शोध वर्ष 2026 में अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। इन अध्ययनों के आधार पर वैज्ञानिकों ने भूभौतिकीय जांच कर जमीन के भीतर पानी जमा करने वाली चट्टानों की पहचान की। इसके बाद पहाड़ी की ऊपरी ढलान पर खाइयां बनाने की योजना तैयार की गई, ताकि बारिश का पानी तेजी से बहने के बजाय जमीन में रिसकर भूजल का पुनर्भरण कर सके। चिह्नित जलधारण क्षेत्र में नियंत्रित रास्ता बनाकर जमीन के भीतर जमा पानी को सतह तक पहुंचाया गया।
इससे नया जलस्रोत विकसित हुआ। यह जलस्रोत कीर्तिनगर ब्लॉक के ऊंचौन गांव में डाकघर तकोली के अंतर्गत चंद्रबदनी मंदिर की ओर जाने वाली नवनिर्मित सड़क के किनारे विकसित किया गया है। आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. केके पंत ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का वास्तविक लाभ तभी है, जब उसका उपयोग आम लोगों की समस्याओं के समाधान में हो। प्रो. मौर्य ने कहा कि जलस्रोतों के व्यवहार और भूजल पुनर्भरण की वैज्ञानिक समझ से पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप स्थायी समाधान विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने जलस्रोत के प्रवाह और गुणवत्ता की निरंतर निगरानी तथा सामुदायिक भागीदारी को भी जरूरी बताया।