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शिक्षा विभाग की डीबीटी योजना धड़ाम

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रुड़की। शिक्षा विभाग की डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) योजना धड़ाम होती नजर आ रही है। इस योजना के तहत अभिभावकों को अपने पैसे से बच्चों की किताबें खरीदनी होगी और इसके एवज में विभाग 150 से 250 रुपये बच्चों के बैंक खाते में डालेगा, लेकिन अधिकतर अभिभावक इस योजना में रुचि नहीं ले रहे हैं। हालत यह है कि शिक्षा सत्र का एक माह गुजरने को है, लेकिन अभी तक दस प्रतिशत बच्चों के पास भी किताबें नहीं हैं। कई स्कूलों में तो एक भी बच्चे के पास किताबें ही नहीं हैं। वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर शिक्षक पुरानी किताबों से काम चला रहे हैं।
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अमर उजाला की टीम ने बृहस्पतिवार को शहर के चार सरकारी स्कूलों का दौरा किया। लेकिन चारों की स्थित दयनीय थी। राजकीय प्राथमिक विद्यालय-एक में 44 बच्चे पढ़ते हैं। इस स्कूल में एक शिक्षिका तैनात हैं। स्कूल के कुल 44 बच्चों में से मात्र पांच बच्चों के अभिभावकों ने किताबें खरीद कर अपनी बच्चों को दी हैं। शेष 39 बच्चों के पास किताबें नहीं हैं। इन्हें शिक्षिका पिछले साल की पुराने पुस्तक पढ़ा रही हैं।
राजकीय प्राथमिक विद्यालय-नंबर छह की हालत भी स्थिति ठीक नहीं थी। विद्यालय में मात्र 15 बच्चें हैं। लेकिन किसी भी बच्चे के अभिभावक ने किताबें नहीं खरीदी। पुराने पुस्तकों से ही बच्चों का पठन पाठन कराया जा रहा हैं। स्कूल में मात्र एक शिक्षिका तैनात हैं।
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राजकीय प्राथमिक विद्यालय-नंबर 12 में 55 छात्र-छात्राएं हैं। दो शिक्षक स्कू ल में तैनात हैं। यहां 55 में से मात्र 11 बच्चों के अभिभावकों ने किताबें खरीदी हैं। यहां भी वैकल्पिक व्यवस्था से पठन पाठन कार्य कराया जा रहा है।
इसके अलावा राजकीय प्राथमिक विद्यालय नंबर 18 में साफ-सफाई व्यवस्था चाक-चौबंद मिली। स्कूल में कुल 123 बच्चें पढ़ते हैं। इनमें से मात्र 25 प्रतिशत बच्चे ऐसे है, जिनके अभिभावकों ने अपने बच्चों को पुस्तकें खरीदकर दी हैं। यहां योजना का स्तर अन्य स्कूलों की अपेक्षा संतोषजनक रहा। इस स्कूल में चार शिक्षक तैनात हैं।
क्या माना जा रहा है कारण
लोगों की मानें तो इस योजना के तहत बच्चों को मात्र 150 से 250 रुपये मिलने हैं। इसके लिए खाता खोलना अनिवार्य किया गया है। खाता खुलवाने के लिए आधारकार्ड और अन्य जरूरी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। यदि यहां तक की भी प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है, तो बैंक इन खातों को घाटे का सौदा मानते हुए किनारा कर रहे हैं। बैंक का मानना है कि एक बार कुछ पैसे आने के बाद यह बैंक खाते एक साल तक के लिए खाली रहेंगे।

अभिभावक नहीं दिखा रहे जागरूकता
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के परिवार की स्थिति जगजाहिर हैं। इन बच्चों के अधिकतर अभिभावक मेहनत-मजदूरी करने वाले हैं। यदि खाता खुलवाने में एक अभिभावक का एक दिन लग जाता है तो उसकी एक मजदूरी बर्बाद हो जाती है। औसतन एक मजदूरी के सापेक्ष उसे करीब तीन सौ रुपये मिलते हैं। दूसरी ओर डीबीटी योजना के तहत खाते में मात्र ढाई सौ रुपये आते हैं। इससे स्पष्ट है कि घाटे वाले इन खातों से अभिभावक योजना से किनारा कर रहे हैं। इसके अलावा विभाग की ओर से योजना के तहत बच्चों के खातों में 250 रुपयों की धनराशी भेजी जानी है, जबकि पुस्तकों की कीमत इससे अधिक बताई जा रही है।

योजना के लिए जिले को मिली 88 लाख की धनराशी
रुड़की। डीबीटी योजना के तहत जिले को 88 लाख का बजट मिल चुका है। इससे जल्द खातों में योजना का लाभ पहुंचने की उम्मीद है। विभागीय अधिकारियों ने प्रत्येक ब्लॉक से बच्चों की बाबत जानकारी मांगी हैं।
सरकार की ओर से डीबीटी योजना का पैसा जिला स्तर पर पहुंच चुका है। बजट मिलने के बाद अब जिला के शिक्षा अधिकारियों ने प्रत्येक ब्लॉक से बच्चों की बाबत जानकारी मांगी हैं। जिसमें खाता संख्या के साथ-साथ अन्य जानकारियां मांगी गई हैं, ताकि प्रत्येक ब्लॉक को जरूरत के अनुसार धन आवंटित किया जाएगा। जिले के अधिकारियों के आदेश मिलने के बाद ब्लॉक स्तर पर आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं। जिससे जल्द से जल्द योजना का पैसा मिलने की उम्मीद जगी है। मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी आरडी शर्मा ने बताया कि ब्लॉक से इस बाबत जानकारियां मांगी गई हैं।

छात्रों के खाते खोलने को पैन की अनिवार्यता समाप्त
जिलाधिकारी ने लीड बैंक मैनेजर को दिए आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
रुड़की। डीबीटी आदि योजनाओं के लिए बैंकों में खाता खुलवाने के लिए अब अभिभावकों के पैन कार्ड की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। जिलाधिकारी दीपक रावत ने इस बाबत हरिद्वार लीड बैंक मैनेजर को आदेश जारी कर दिए हैं। जिससे छात्र-छात्राओं के अभिभावकों को राहत मिलेगी।
शिक्षा विभाग ने डीबीटी योजना के लिए सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का बैंक खाता अनिवार्य किया है। क्योंकि इन खातों में ही डीबीटी योजना के लाभ की धनराशि भेजी जानी है। खाता खुलाने के लिए अभिभावक का पैनकार्ड और छात्र-छात्रा का आधारकार्ड अनिवार्य हैं। अधिकतर अभिभावकों के पास पैनकार्ड न होने की दशा में खाता खोलने में दिक्कतें आ रही थी। जिससे शिक्षा विभाग के अधिकारियों को लगातार शिकायतें मिल रही थी। शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने जिलाधिकारी दीपक रावत को शिकायतों से अवगत कराया था। इस पर जिलाधिकारी ने हरिद्वार के लीड बैंक अधिकारी को आदेशित किया है कि छात्र-छात्राओं के बैंक खाते खोलने में पैन कार्ड की अनिवार्यता समाप्त की जाए। जिला मुख्य शिक्षा अधिकारी रुपेंद्र दत्त शर्मा ने मामले की पुष्टि की है।
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