यदि आपका कोई परिचित या परिजन क्रॉनिकल किडनी डिजीज से जूझ रहा है तो समय रहते किडनी ट्रांसप्लांट के लिए पंजीकरण जरूर कराएं। भविष्य में मरीज को किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ सकती है। पंजीकरण न होने से किडनी ट्रांस प्लांट की प्रक्रिया में लंबा समय लगेगा। जो मरीज की जान पर भारी पड़ सकता है।
भारत में 10 फीसदी मरीज ही किडनी ट्रांसप्लांट करा पा रहे हैं। इसके पीछे किडनी ट्रांसप्लांट की औपचारिकताओं की जानकारी की कमी, अंगदान के प्रति जागरूकता न होना है। लोगों में अभी भी अंगदान को लेकर भ्रांतियां है। किडनी ट्रांसप्लांट को लेकर कड़े नियम कानून व पंजीकरण की बाध्यता है। लेकिन अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी नहीं हैं।
नियमानुसार किसी मरीज को नजदीकी रिश्तेदार (पति/पत्नी, बच्चे, पोते-पोतियां, भाई-बहन, माता-पिता और दादा-दादी) को अपनी किडनी दान कर सकते हैं। यदि परिजन किडनी डोनेट नहीं कर पा रहे हैं तो ऐसे में मरीज को कैडेवर डोनर से किडनी ट्रांसप्लांट की जाती है।
लेकिन इस प्रक्रिया की औपचारिकताएं काफी लंबी है। इसमें कम से कम छह महीने का समय लग जाता है। एम्स ऋषिकेश में किडनी ट्रांसप्लांट और पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध है। मरीज सीधे एम्स के नेफ्रोलॉजी विभाग में जाकर संपर्क कर सकते हैं। संवाद
क्या है कैडेवर डोनर
मेडिकल भाषा में मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर को कैडेवर कहा जाता है। जब मृत व्यक्ति के शरीर से उसके आंतरिक अंग निकाल कर किसी जीवित व्यक्ति को दान में दिए जाते हैं तब मृत व्यक्ति को कैडेवर डोनर कहा जाता है। यह दान इसलिए किया जाता है। यह अंग तब ही जीवित व्यक्ति के शरीर में लगाए जाते हैं जब वह अंग स्वस्थ हों।
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Iलोगों को किडनी ट्रांसप्लांट की औपचारिकताओं की जानकारी कम है। अंगदान के प्रति भी लोग जागरूक नहीं हैं। जिससे क्रॉनिकल किडनी डिजीज से पीड़ित लोगों को समय पर प्रत्यारोपण के लिए किडनी नहीं मिल पाती है। इस संबंध में जागरूक होने की आवश्यकता है। डॉ. शेरोन कंडारी, असिस्टेंट प्रोफेसर, नेफ्रोलॉजी विभाग, एम्सI