नगर निगम में प्रदूषण को लेकर आयोजित बैठक।
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तीर्थनगरी में लगातार हो रहे निर्माण, ध्वस्तीकरण, कूड़े को जलाने और बढ़ते वाहनों ने यहां की आबोहवा को जहरीला कर दिया है। इसकी पुष्टि उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट से हुई है। वर्ष 2012 में ऋषिकेश क्षेत्र में पर्टिकुलर मैटर (पीएम) 10 का स्तर 102.25 माइक्रो ग्राम थी, जो वर्ष 2018 में बढ़कर 129.33 हो गई है। तेजी से बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताते हुए सोमवार को उत्तराखंड प्रदूषण बोर्ड (यूपीसीबी) ने निगम सहित विभिन्न विभागों के अफसरों के साथ बैठक की।
बोर्ड ने रिपोर्ट जारी कर जहरीले होते वातावरण पर चिंता व्यक्त करने के साथ ही वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के सुझाव मांगे। सोमवार को स्वर्ण जयंती सभागार में आयोजित बैठक में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अमित पोखरियाल ने बताया कि नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के तहत उत्तराखंड के दो शहरों को चिह्नित किया गया है। इसमें एक काशीपुर तथा दूसरा ऋषिकेश शामिल है। इन दोनों शहरों की वर्ष 2015 में वायु की गुणवत्ता में कमी पाई गई थी।
उन्होंने बताया कि एमवेटेयर मॉनटरिंग के तहत सप्ताह में दो बार वायु की जांच की जाती है। इसकी रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने कहा कि वातावरण प्रदूषित होना वाकई चिंता का विषय है। उन्होंने बताया कि जब आबोहवा प्रदूषित होने का कारण परिवहन विभाग, नगर निगम तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जाना तो सामने आया कि तेजी से हो रहे नव निर्माण, ठोस अपशिष्ट पदार्थों को जलाना तथा ध्वस्तीकरण है। उन्होंने बताया कि सभी विभागों से इसकी रोकथाम को लेकर सुझाव मांगे गए है।
चर्चा के दौरान सोते रहे अफसर
सोमवार को नगर निगम में ऋषिकेश की आबोहवा जैसे गंभीर मुद्दे को लेकर बैठक चल रही थी। तभी निगम के जिम्मेदार पद पर बैठे हुए अफसर नींद का मजा लेते दिखाई दिए। बैठक समाप्त होने के बाद इसका जवाब जब मुख्य नगर आयुक्त चतर सिंह चौहान से मांगा तो उन्होंने कहा कि बैठक की विजुअल देखने के बाद आरोपों की पुष्टि होने पर दोषी अफसर से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा।