अगस्त 2014 में यमकेश्वर में आई आपदा के निशां आज भी हेंवल घाटी के गांवों में भीभत्स मंजर की गवाही दे रहे हैं। आपदा के दौरान हेंवल नदी में आई बाढ़ के कारण बैरागढ़ और पसतोड़ा गांव लगभग नेस्तनाबूद हो गए थे। लेकिन पौने दो साल बाद भी इन गांवों के हालात नहीं सुधरे हैं।
आपदा में टूटी सिंचाई नहरों की मरम्मत नहीं होने से हेंवल घाटी में हरियाली से लहलहाते खेत अब बंजर पड़े हैं। नदी किनारे बाढ़ सुरक्षा उपाय नहीं होने से गांवों के बाशिंदों को आने वाली बरसात में बाढ़ का खतरा अभी से सताने लगा है।
आपदा के बाद शासन और प्रशासन ने गांवों के पुनर्वास और सुरक्षात्मक उपाय के साथ ही क्षतिग्रस्त संपर्क मार्गों, सिंचाई गूलों की मरम्मत के दावे तो खूब किए, लेकिन किया कुछ नहीं। हेंवल नदी के किनारे बसे गांवों के हालात आपदा के मंजर को बयां करने के साथ ही सरकारी दावों की पोल खोल रहे हैं।
नहीं हुए बाढ़ सुरक्षा उपाय, खतरा बरकरार
2014 की आपदा में सबसे अधिक प्रभावित बैरागढ़, पसतोड़ा, रत्तापानी और घट्टूगाड़ आदि गांवों में 20 महीने बाद भी न तो कहीं बाढ़ सुरक्षा उपाय किए गए हैं और न ही बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित बैरागढ़, पसतोड़ा गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया ही शुरू की जा सकी है।
उक्त गांवों में पहाड़ियों के दरकने और हेंवल की बाढ़ में बहकर आए मलबे के ढेर आज भी मौजूद हैं। लेकिन मलबा हटाने, संवेदनशील नदी तटों पर बाढ़ सुरक्षा तट बंध निर्माण जैसे जरूरी कार्य कहीं नहीं हो पाए।
घट्टूगाड़ में अधूरी बाढ़ सुरक्षा दीवार
बाढ़ से प्रभावित घट्टूगाड़ क्षेत्र में सिंचाई विभाग बाढ़ सुरक्षा दीवार का अधूरा निर्माण कर चलता बना। विभाग ने जिस बाढ़ सुरक्षा दीवार पर लाखों रुपये खर्च किए हैं, वह भी बाढ़ सुरक्षा करने में कामयाब होता नहीं दिख रहा।
ऐसी स्थिति में आने वाले बरसात में यदि हेंवल में 2014 जैसी बाढ़ आती है तो क्षेत्र को तो नुकसान होगा ही, नवनिर्मित बाढ़ सुरक्षा दीवार भी बह सकता है। दरअसल, यहां बनाई गई दीवार और आपदा से खेतों में हुए भूकटाव के बीच के हिस्से पर भरान नहीं किया गया है, जिससे बाढ़ का पानी खेतों को तो नुकसान पहुंचाएगा ही, खाली स्थान में पानी घुसने से दीवार भी जमींदोज हो सकती है।
सिंचाई गूलें क्षतिग्रस्त, लोगों ने छोड़ी खेती
सिंचाई विभाग घट्टूगाड़, रत्तापानी क्षेत्र में आपदा में क्षतिग्रस्त सिंचाई नहरों की मरम्मत नहीं करा पाया है। जिससे कभी हरियाली से आच्छादित रहने वाले ग्रामीणों के खेत अब बंजर हो गए हैं। लोगों को सिंचाई संसाधन के अभाव खेती करने में परेशान हो रही है। जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सरकारी स्कूलों के अस्तित्व पर संकट
हेंवल की बाढ़ से घट्टूगाड़ में हुए भूस्खलन के कारण राजकीय प्राथमिक विद्यालय और उच्च प्राथमिक विद्यालय का आंगन और शौचालय क्षतिग्रस्त हो गया था। क्षतिग्रस्त पहाड़ी पर ट्रीटमेंट का कार्य आज तक नहीं किया गया है। जिससे विद्यालयों का अस्तित्व संकट में है। साथ ही दरकते आंगन से यहां अध्ययनरत नौनिहालों को भी खतरा बना हुआ है।
लोग बोले, शासन उदासीन
रत्तापानी के सामाजिक कार्यकर्ता सत्यपाल सिंह राणा, बैरागढ़ के विनोद जुगलाण ने बताया कि गांवों के हालात में कोई सुधार नहीं हो पाया है। लोगों के खेत खलिहान बह चुके हैं। खेती बाड़ी प्रभावित हो रही है। सरकार को बड़े पैमाने पर हुई क्षति में सुधार करना कर चिह्नित गांवों को विस्थापित किया जाना चाहिए।
इनका कहना है
आपदा के बाद जिले की क्षति के आंकलन पर शासन को 18 करोड़ का प्रस्ताव भेजा गया है। लेकिन फिलहाल धनावंटन नहीं हो पाया है। शासन इसके लिए धनाभाव बता रहा है। जिससे बाढ़ सुरक्षा उपाय, गूलों की मरम्मत जैसे जरूरी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। धन मिलते ही सारे कार्य किए जाएंगे।
-चंद्रशेखर भट्ट, जिलाधिकारी, पौड़ी गढ़वाल