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मरणोपरांत पद्म भूषण से नवाजे गए स्वामी दयानंद

Tue, 26 Jan 2016 02:10 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/ऋषिकेश
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुरु और वेदांत और उपनिषदों के मर्मज्ञ ब्रह्मलीन स्वामी दयानंद सरस्वती को भारत सरकार से मरणोपरांत पद्म भूषण अवार्ड से नवाजने की घोषणा की है। दुनिया को वेदांत, उपनिषदों का ज्ञान देने वाले इस आध्यात्मिक महापुरुष ने अपने जीवनकाल में भारतीय दर्शन से विश्व को रूबरू कराया।
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भारतीय दर्शन के इस विद्वान संत को इससे पूर्व 26 अप्रैल-2012 को आद्य शंकराचार्य सम्मान से नवाजा जा चुका है। उन्हें शंकर जयंती के उपलक्ष्य में श्रंगेरी तमिलनाडु स्थित श्रंगेरी शारदा पीठ में आयोजित समारोह में पीठ के शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ महाराज ने आद्य शंकराचार्य अवार्ड से सम्मानित किया था।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में अस्वस्थ चल रहे आध्यात्मिक गुरु का हालचाल जानने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते साल 11 सितंबर-2015 को तीर्थनगरी आए थे। उन्होंने शीशमझाड़ी स्थित आश्रम पहुंचकर महाराज का हालचाल जाना था।
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जबकि बीते साल 20 सितंबर को विहिप के अंतराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने अस्वस्थता के दौरान स्वामी दयानंद से मिलने हिमालयन अस्पताल पहुंचे थे। दुनिया को वेद-वेदांत और भारतीय दर्शन का बोध कराने वाले संत दयानंद 23 सितंबर-2015 को ब्रह्मलीन हुए थे। उन्हें आश्रम परिसर में 25 सितंबर को भू-समाधि दी गई थी।

मंजाकुड़ी तमिननाडु मूल के नटराजन (स्वामी दयानंद) की वाल्यकाल से ही आध्यात्म में गहरी रूचि थी, उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने के लिए आजीविका के साधन के तौर पर सबसे पहले धार्मिक पत्रिका में बतौर पत्रकार काम किया। स्वामी दयानंद ने जीवन पर्यंत देश-दुनिया में आध्यात्म के प्रचार और लोगों को इसके लिए प्रेरित करने में बीता।

स्वामी दयानंद का जन्म 15 अगस्त, 1930 में मंजाकुडी गांव, तिरुवन्नरु,तमिलनाडु में हुआ। बचपन में उनका नाम नटराजन था। उनके पिता गोपाल अय्यर और माता बालंबाला था। चार भाइयों में सबसे बडे़ नटराजन की प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु के कोडवसाल जिले में हुई। जब वह आठ साल के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया था।

दयानंद आश्रम से मिली जानकारी के मुताबिक शिक्षा पूरी करने के बाद पारिवार के आजीविकोपार्जन के लिए उन्होंने एक धार्मिक पत्रिका में पत्रकार के रूप में भी काम किया। वेदांत और उपनिषद में गहरी रुचि होने  के कारण वह 1952-53 में स्वामी चिन्मयानंद से जुड़ गए। इसके बाद उन्हें चिन्मय मिशन में सचिव का दायित्व दिया गया।

1955 में नटराजन (स्वामी दयानंद) ने स्वामी चिन्मयानंद के साथ पांडुलिपी में उत्तरकाशी नामक पुस्तक लिखी। इस दौरान उनकी भेंट चिन्मायनंद के गुरु स्वामी तपोवनम महाराज से हुई। 1956 में वह बैंगलौर चले गए। वहां उन्होंने चमराजपेट के एक संस्कृत कालेज में अध्यापन का कार्य किया।

बैराग्य भावना उत्पन्न होने के कारण 1961 में स्वामी चिन्मायनंद की अनुमति से उन्होंने सन्यास जीवन धारण कर दिया। स्वामी चिन्मायनंद ने सन्यास दीक्षा दी, जिसके बाद उनका नाम दयानंद सरस्वती पड़ा। स्वामी दयानंद नवंबर- 1963 में ऋषिकेश आए। यहां वह अपने सन्यास के प्रारंभिक दिन एक घास की झोपड़ी में रहे।

करीब तीन साल के प्रवास के दौरान उन्होंने ब्रह्मविद्यापीठ, कैलासआश्रम के स्वामी तारानंदा महाराज से ब्रह्मसूत्र की शिक्षा ली। स्वामी ने 1970 से उपनिषदों की शिक्षा का प्रचार प्रसार शुरू किया, जिसे उन्होंने भारत के साथ ही विश्व फलक तक पहुंचाया। 1972 से 1979 तक स्वामी दयानंद ने मुंबई में वेदांत पाठ्यक्रम का आयोजन भी किया।

1979 में अमेरिकी छात्रों के अनुरोध पर स्वामी दयानंद ने कैर्लिफोर्निया में तीन साल वेद और उपनिषद की शिक्षा दी। वह 1982 में भारत लौटे मगर यहां भी वेद और उपनिषदों के प्रचार प्रसार में जुटे रहे।


जीवन में किया 73 आध्यात्मिक पुस्तकों का सृजन
स्वामी दयानंद सरस्वती ने जनमानस के आध्यात्मिक कल्याण के लिए 1990 में आर्ष विद्या गुरुकुलम पुस्तक से आध्यात्मिक लेखन की शुरुआत की। हालांकि 1955 में नटराजन (स्वामी दयानंद) द्वारा स्वामी चिन्मयानंद के साथ पांडुलिपी में उत्तरकाशी नामक पुस्तक लेखन का उल्लेख भी मिलता है।

उन्होंने अपने आध्यात्मिक जीवनकाल में अंग्रेजी, हिंदी आदि भाषाओं में करीब 73 पुस्तकों का सृजन किया। स्वामी ने अर्जेंटीना, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, भारत, मलेशिया, सिंगापुर और ब्रिटेन में डिवाइन गीता का उपदेश देकर लोगों में आध्यात्मिक चेतना का संचार किया।


बचपन से निभाई पारिवारिक जिम्मेदारी  
नटराजन यानि स्वामी दयानंद की आठ साल की अवस्था में ही उनके पिता गोपाल अय्यर का निधन हो गया था। प्राप्त जानकारी के मुताबिक इसके बाद परिवार में चार भाइयों में सबसे बड़े नटराजन पर शिक्षा के साथ-साथ परिवार की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई। शिक्षा पूरी होने के बाद वह आजीविकोपार्जन के लिए चेन्नई चले गए।

जहां उन्होंने एक धार्मिक पत्रिका में बतौर पत्रकार के रूप में भी काम किया। सूत्रों के मुताबिक वायुसेना में लड़ाकू पायलट बनने की ख्वाइश के चलते उन्होंने भारतीय वायु सेना ज्वाइन कर दी। मगर सेना के कड़े अनुशासन के कारण घुटन महसूस होने पर नौकरी छोड़ दी।
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