कहते हैं कि अपराधी कितना भी शातिर क्यों न हो... वह घटना के बाद कुछ न कुछ सुराग छोड़ ही देता है। वही सुराग पुलिस के लिए अपराधियों तक पहुंचने में मददगार साबित होते हैं।
नितिन हत्याकांड में भी शातिर अपराधी पूरी सतर्कता के बाद भी कुछ गलतियां कर बैठे। मुख्य आरोपी का हत्याकांंड के बाद तुरंत जमानत तुड़वाकर जेल जाना और शूटरों के फ्लैट का ऑनलाइन किराया भुगतान पुलिस के लिए मददगार साबित हुआ। नितिन की हत्या की साजिश पांच महीने से रची जा रही थी।
मुख्य आरोपी विपिन नैय्यर जनवरी में जमानत पर रिहा हुआ था। उसने बिमलेश के सहयोग से दो शूटरों को हायर किया। उन्हें डिकॉन वैली सोसाइटी में किराये पर फ्लैट दिलवाया। शूटर हर समय अलर्ट रहते थे। जब भी वह अपने फ्लैट से किसी कार्य के लिए बाहर निकलते तो मास्क या हेलमेट पहनते थे। जिससे कि सोसाइटी के किसी भी सीसीटीवी कैमरों में उनकी पहचान न हो सके। दोनों जिस सिम का प्रयोग करते थे, वह भी फर्जी आईडी पर लिए थे। शूटर अपना कोई वाहन भी नहीं लेकर आए थे।
सोसाइटी से बाहर जाने के लिए वह गार्ड की स्कूटी किराये पर लेते थे। फ्लैट का किराया भी ऑनलाइन माध्यम से दिया जाता था। पुलिस को एक शूटर का जो आधार कार्ड उपलब्ध हुआ था वह भी फर्जी था। पहचान के लिए कोई सुराग न होने से पुलिस के लिए यह हत्याकांड एक ब्लाइंड केस बन गया था। हत्याकांड के तुरंत बाद विपिन अपनी जमानत तुड़वाकर जेल चला गया था। इससे पुलिस का शक बिपिन की तरफ गया।
पुलिस ने उसे केंद्र में रखकर जांच शुरू कर दी। शूटरों के फ्लैट का ऑनलाइन किराया भुगतान भी पुलिस के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। पुलिस घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, बिपिन की कॉल डिटेल, फ्लैट का ऑनलाइन किराया भुगतान आदि कड़ियों को जोड़ते हुए बिमलेश तक पहुंची।