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उल्टी गंगा बहा रहा उच्च शिक्षा निदेशालय

Tue, 12 Jan 2016 01:39 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/ऋषिकेश
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उच्च शिक्षा निदेशालय हल्द्वानी उच्च शिक्षा में संस्कृत के सहायक प्राध्यापकों और आचार्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में उल्टी गंगा बहा रहा है। इस पद के लिए हाल ही में मांगे गए आवेदनों में परंपरागत संस्कृत शिक्षा प्रणाली से आचार्य उपाधि धारक, नेट और पीएचडी होल्डरों को पात्रता के बाद भी बाहर कर दिया गया।
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जबकि सामान्य प्रणाली से एमए संस्कृत डिग्रीधारक, नेट और पीएचडी पात्रता वालों को वरीयता दी गई। खास बात यह है कि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) दोनों ही संस्कृत आचार्य को इस पद के लिए अर्ह मानते हैं।

19 अक्तूबर 2015 को उत्तराखंड उच्च शिक्षा निदेशालय हल्द्वानी की ओर से प्रकाशित विज्ञापन में राजकीय महाविद्यालयों में विभिन्न विषयों के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर (गेस्ट फैकल्टी) के आवेदन मांगे गए। इसमें संस्कृत विषय के 35 पदों के लिए परंपरागत संस्कृत शिक्षा प्रणाली से आचार्य उपाधि धारकों ने भी आवेदन किया था।
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लेकिन संस्कृत से आचार्य उपाधि धारकों को इस पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया। जबकि, सामान्य शिक्षा से एमए संस्कृत उपाधि धारकों को योग्य मानते हुए साक्षात्कार में शामिल किया गा। इसके बाद बीते महीने 24 दिसंबर 2015 को 30 पदों के लिए सूची भी जारी कर दी गई है। जानकारों की मानें तो इस पद के लिए संस्कृत आचार्य अर्हता रखते हैं।

यूजीसी और लोक सेवा आयोग उत्तराखंड की नियमावधि भी यही कहती है। लेकिन उच्च शिक्षा निदेशालय ने परंपरागत संस्कृत का पठन-पाठन करने वाले लोगों को योग्यता के बावजूद इस पद से महरूम रखा। यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार ने वर्ष 2010 में संस्कृत को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया है। निदेशालय ने उसी संस्कृत भाषा की परंपरागत शिक्षा प्राप्त आचार्यों को संस्कृत प्राध्यापक पद के लिए अयोग्य ठहरा दिया।


केस-एक
उच्च शिक्षा निदेशालय से हमें बताया कि परंपरागत संस्कृत आचार्य उपाधि धारक इस नियुक्ति प्रक्रिया के योग्य नहीं हैं।-डॉ. प्रकाश चंद्र उप्रेती, साहित्य आचार्य, नेट, पीएचडी निवासी हल्द्वानी


केस-दो
इस संबंध में उच्च शिक्षा निदेशक और उच्च शिक्षा मंत्री से मिलने पर हमें बताया गया कि यह अवसर आपके लिए नहीं है। दूसरे अवसर तलाशें।-सुरेश चंद्र जोशी, व्याकरणाचार्य,  नेट, पीएचडी अध्ययनरत, निवासी हरिद्वार


केस -तीन
मुझे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था, लेकिन यह कहकर बाहर कर दिया कि संस्कृत की आचार्य उपाधि एमए के समकक्ष नहीं है।-दिनेश चंद्र पांडेय, साहित्य आचार्य, नेट/जेआरएफ  (जूनियर रिसर्च फेलोशिप), निवासी चंपावत


केस-चार
सरकार परंपरागत संस्कृत से जुड़े लोगों से दोयम दर्जे का व्यवहार कर रही है। इससे प्रदेश में इस भाषा के प्रति रुझान कम हो रहा है। इस पद के लिए संस्कृत आचार्य उपाधि धारक ही सर्वाधिक योग्य थे। लेकिन उन्हें कुतर्क देकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।-डॉ. नारायण प्रसाद भट्टराई, आचार्य वेद, पीएचडी, निवासी ऋषिकेश


क्या कहते हैं विशेषज्ञ
संस्कृत आचार्य की उपाधि एमए संस्कृत विषय की उपाधि से कहीं बेहतर है। क्योंकि  यह उपाधिधारक संस्कृत का जानकार होते हुए वेद, साहित्य, व्याकरण, ज्योतिष आदि विषय का विशेषज्ञ भी होती है। बावजूद इसके उच्च शिक्षा निदेशालय द्वारा आचार्य उपाधि प्राप्त अभ्यर्थियों से यह सलूक अनुचित और भेदभावपूर्ण है।

लगता है कि इस प्रक्रिया में शामिल लोग अपेक्षाकृत इस कार्य के लिए कम जानकार थे। इस विषय में पात्रता का यदि पहला हक था तो वह संस्कृत आचार्यों का ही था।-शिव शंकर मिश्र, विभागाध्यक्ष संस्कृत, राजकीय महाविद्यालय, कोटद्वार।

यह मामला हमारे संज्ञान में आया है। मैंने तीन दिन पहले अपनी ओर से सरकार को पत्र लिखकर इस तरह के आचरण पर आक्रोश व्यक्त किया है। आज ही रजिस्ट्रार की ओर से भी दूसरा पत्र सरकार को भेजा गया है। हम अगले दो-तीन दिनों में समय लेकर उच्च शिक्षा सचिव और विभागीय मंत्री से मिलकर अपनी बात रखेंगे।

संस्कृत आचार्य के साथ किसी भी रूप में भेदभाव ठीक नहीं। यह उपाधि एमए संस्कृत के समान ही है।-प्रो. महावीर अग्रवाल, कुलपति उत्तराखंड संस्कृत विवि, हरिद्वार।
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