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नोटिस जारी करने से पहले सहायक नगर आयुक्त खंगालेंगे फाइलें

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फाइल - फोटो : Getty
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ब्यूरो/अमर उजाला, ऋषिकेश। शासनादेश के मुताबिक कर वसूली न होने और दो करोड़ से ज्यादा की राशि की चपत लगाने के मामले में निगम अधिकारियों का रवैया अब भी लापरवाही वाला बना हुआ है। बीते 21 जनवरी को हुई बोर्ड बैठक में नगर आयुक्त ने जांच गठित कर एक हफ्ते में रिपोर्ट हासिल करने का जो भरोसा दिलाया था उसका भी कहीं अता पता नहीं है। गंभीर मसला यह है कि अभी तक घाटे की जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच ही गठित नहीं हो पाई है। नगर आयुक्त ने नोटिस जारी करने से पहले सहायक नगर आयुक्त उत्तम सिंह नेगी को फाइलों की जांच का जिम्मा सौंपा है। उसके बाद अंतिम रूप से नोटिस जारी किया जाएगा। यह अब भी तय नहीं है कि अध्ययन की मियाद कब तक है।
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गौरतलब है कि वर्ष 2014 में शासनादेश जारी किया गया था कि तत्कालीन पालिका प्रबंधन अपने अधीन दुकानों से सर्किल रेट के आधार पर किराया वसूली करे। यह प्रस्ताव तत्कालीन बोर्ड में भी पास हो गया था। हैरानी की बात यह है कि आदेश जारी होने से लेकर अब तक शासनादेश पर अमल नहीं हो पाया। निगम बनने के बाद दस्तावेजों की पड़ताल की गई तो करीब 2 करोड़ पांच लाख से ज्यादा का घाटा सामने आया। मौजूदा हालात ये हैं कि कुल 187 दुकानों में से 80 फीसदी दुकानें नियमों के विपरीत बेच दी गई हैं। इतना ही नहीं नियम विरुद्घ तरीके से दुकानों का स्वरूप तक बदल दिया गया है। इस प्रकरण को ‘अमर उजाला’ ने प्रमुखता से प्रकाशित किया।
यह मामला बीते 21 जनवरी को हुई बोर्ड बैठक में भी उठा जिसमें अमर उजाला की खबरों का जिक्र भी किया गया। इसी दौरान मुख्य नगर आयुक्त प्रेमलाल ने सदन को भरोसा दिलाया कि शासनादेश के मुताबिक कर वसूली न होने के मामले में जांच गठित की जाएगी। साथ ही एक हफ्ते में रिपोर्ट हासिल कर जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी पर नियमानुसार कार्रवाई होगी। हकीकत यह है कि पालिका से उच्चीकृत होकर नगर निगम तो बन गया लेकिन कार्यप्रणाली पुराने ढर्रे पर ही चल रही है।
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सदन की अवहेलना पर पार्षदों में उबाल
शासनादेश के मुताबिक कर वसूली न होने से निगम को हुई आर्थिक क्षति मामले में अधिकारियों की वायदा खिलाफी से पार्षद खफा हैं। पार्षद मनीष शर्मा का कहना है कि मुख्य नगर आयुक्त ने बोर्ड बैठक में कहा था कि निगम को हुई आर्थिक क्षति मामले में एक हफ्ते में जांच रिपोर्ट हासिल की जाएगी। वायदे के मुताबिक मुख्य नगर आयुक्त ने अब तक जांच तक गठित नहीं की है। यह सदन की भी अवहेलना है। इस संदर्भ में मेयर से वार्ता की जाएगी। उधर, पार्षद विकास तेवतिया का कहना है कि निगम अफसरों का हमेशा से ही टालमटोल भरा रवैया रहा है। निगम की आय बढ़ाने को लेकर मुख्य नगर आयुक्त गंभीर नहीं हैं। अगली बोर्ड बैठक तभी संचालित होगी जब वायदे के मुताबिक नगर आयुक्त जांच रिपोर्ट पटल पर रखेंगे।

पालिका बोर्ड ने किया था अवैध आवंटन
निगम की संपत्तियों को खुर्दबुर्द करने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। नियमों के मुताबिक आश्रम के कमरे किसी संस्था को आवंटित ही नहीं किए जा सकते। इसके बावजूद तत्कालीन पालिका प्रबंधन ने सिर्फ दो कमरे आवंटित ही नहीं किए बल्कि अफसरों ने दो कदम आगे बढ़कर दो अन्य कमरे और बरामदा बनवाकर पर्वतीय प्रेस क्लब के हवाले कर दिया। इतना ही नहीं कई सालों से कर वसूली भी नहीं की गई। सोमवार को इस मामले की फाइल मुख्य नगर आयुक्त प्रेमलाल के सामने आई तो उन्होंने मातहतों से राय लेना शुरू किया। इसी दौरान आवंटन रद्द करने का प्रस्ताव भी आया। इस पर सहायक नगर आयुक्त ने बताया कि बोर्ड के फैसले को बोर्ड में ही निरस्त किया जा सकता है। लिहाजा आवंटन निरस्त करने का प्रस्ताव आगामी बोर्ड बैठक में रखा जाएगा। इसके बाद निरस्तीकरण की कार्रवाई होगी।
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