महज 10वीं तक की पढ़ाई करने वाले मशहूर विलेन प्राण ने कभी फिल्मों में आने के बारे में नहीं सोचा। वह तो फोटोग्राफर बनना चाहते थे।
यही वजह है कि उन्होंने बाकायदा शिमला में ए दास एंड कंपनी में फोटोग्राफी की ट्रेनिंग भी ली। 1941-42 में मसूरी चले आए। यहां फोटोग्राफी की दुकान खोली और लगभग एक साल तक अपने मित्र एम खेड़ा केसाथ यहां काम भी किया, लेकिन काम जमा नहीं। किस्मत में तो सिलवर स्क्रीन पर जगमगाना लिखा था।
बेटे को ले मुंबई पहुंच गए
लिहाजा 40 के दशक के आखिर में एक दिन सामान बांध पत्नी और अपने एक साल के बेटे को ले मुंबई पहुंच गए। दून से प्राण का नाता पिता के काम के चलते रहा। यहां कालसी पुल का ठेका प्राण के पिता केवल सिकंद के पास था, जो सरकारी सिविल कांट्रेक्टर थे।
धुएं के छल्ले उड़ाते प्राण ने क्रूर विलेन के रूप में पहचान कायम की। 1949 में ‘बड़ी बहन’ फिल्म से यह ट्रेंड शुरू हुआ, जो उनका ट्रेडमार्कबन गया। उत्तरांचल फिल्म चैंबर आफ कामर्स के आरके वर्मा ने उनके निधन को बड़ी क्षति करार दिया।
छड़ियां एकत्र करने का भी था शौक
प्राण को चरित्र की जरूरत के मुताबिक कुछ फिल्मों में सफेद छड़ी को घुमाते, इसके सहारे चलते खूब फिल्माया गया, लेकिन यह सच है कि उन्हें छड़ियां एकत्र करने का बहुत शौक था। उनके पास कई तरह की छड़ी थीं।
अमिताभ से ज्यादा लगी प्राण की कीमत
विलेन के रूप में प्राण की प्रसिद्धि इस कदर थी कि अपनी फिल्मों के लिए कई बार उन्हें हीरो से ज्यादा मोल मिला। 1978 में ‘डान’ फिल्म में अमिताभ बच्चन को ढाई लाख मिले थे, जबकि प्राण को साढ़े सात लाख।
तब पांच सौ में से सौ रुपये एडवांस मांगे
बात उस वक्त की है जब प्राण मुंबई नए-नए गए थे। एक फिल्म के लिए पांच सौ रुपये का भुगतान एडवांस हुआ। आलम यह था कि प्राण को भरोसा नहीं हो रहा था। उन्होंने इसमें से सौ रुपये एडवांस मांग लिए।
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