हवाई उड़ानें पहाड़ों की ‘जान’ ले सकती हैं। इनकी साउंड फ्रीक्वेंसी से न केवल कच्चे पहाड़ दरक सकते हैं, बल्कि इको सिस्टम के लिए भी यह सेवाएं मुनासिब नहीं।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान के ग्लेशियर विशेषज्ञ डा. डीपी डोभाल के अनुसार बड़ी मात्रा में उड़ानों से न केवल डस्ट जमा हो रहा है, बल्कि पहाड़ को बांधे रखने वाला मैटीरियल भी लूज हो रहा है। भविष्य में इसका नकरात्मक असर देखने को मिल सकता है।
नुकसान का आंकलन नहीं किया
उनकी मानें तो अभी तक भारी बारिश, भू-स्खलन समेत प्राकृतिक आपदाओं से जितना नुकसान हुआ है, वह सब केदारधाम से नीचे की तरफ हुआ है। केदारधाम को कभी नुकसान नहीं पहुंचा। हवाई सेवाएं शुरू हुए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ। इनकी वजह से पड़ने वाले नुकसान का आंकलन नहीं किया गया।
उधर, केदार घाटी में आई आपदा से ग्लेशियरों पर किया जा रहा अध्ययन भी प्रभावित हो गया है। घाटी क्षेत्र में स्थित चोरबारी ग्लेशियर में वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान के ग्लेशियोलाजी सेंटर की ओर से से तीन टावर लगाए गए थे।
इसमें से एक रामबाड़ा में लगाया गया था, जबकि दूसरा बेस कैंप में और तीसरा हाई कैंप में लगाया गया था। इनमें से रामबाड़ा वाला टावर बह गया है। बेस कैंप वाला टूट गया है, जबकि तीसरा टावर सुरक्षित है या नहीं, इस बात की कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। मौसम के थोड़ा ठीक होते ही उसका पता लगाया जाएगा।