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आपदा से पहाडों में ‘कैद’ लोगों को आजाद करने की जरूरत

Sat, 06 Jul 2013 08:45 AM IST
सुधाकर भट्ट
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पहाड़ में आपदा अकेले नहीं आती बल्कि मुसीबतों का सैलाब भी अपने साथ लाती है। केदार और बदरीनाथ की घाटियों में तबाही के बाद यह बात एक बार फिर से सच साबित हो रही है।
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अलकनंदा और मंदाकिनी ने सीमा लांघी तो पहाड़ भी उखड़ गए। दोनों घाटियों में सामाजिक और आर्थिक जिंदगी ठहरी ही, 20 दिन बाद भी घाटियों की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ सकी। इस तबाही के लिए राज्य आपदा प्रबंधन तंत्र के पास बस ही शब्द ‘बादल फटना’ ही है।

पहाड़ की बाढ़ में तो जमीन तक बह जाती है
मैदान में बाढ़ आती है तो घर डूबते हैं या बह जाते हैं और जमीन बची रहती है। लेकिन पहाड़ की बाढ़ में तो जमीन तक बह जाती है। आपदा प्रबंधन की शब्दावली में पहाड़ में नुकसान की भरपाई का मोल और आपदा मोचन निधि के मानक मैदानी क्षेत्र के समान है। शायद यह वजह है कि तंत्र भी पहाड़ में बादल फटने से ठीक उसी तरह निपटने की कोशिश करता है जैसे मैदान की बाढ़ से।
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एक बानगी देखिए, पहले फंसे लोगों को हेलीकाप्टर से निकालने पर जोर रहा और अब राहत सामग्री बांटने का अंदाज ऐसा है मानों आदमी किसी टापू पर बैठा है और उसके पास खाने-पीने को कुछ नहीं है। गांवों को हेलीकाप्टर और अन्य माध्यमों से राशन पहुंचाने की बात की जा रही है। यह कोई नहीं समझ रहा है कि पूरा गांव एक कैदखाना बन गया है। लोगों की पहली जरूरत इस कैदखाने से आजाद होने की है। इसके बाद ही वह बता सकता है कि उसकी जरूरत आखिर है क्या।

अलग नजरिए की जरूरत
राशन पहुंचाने के साथ ही संपर्क मार्ग को पटरी पर लाना किसी की प्राथमिकता में नहीं है। लग रहा है कि संपर्क मार्ग भी पानी उतरने से पहले ठीक ही नहीं किए जा सकते। यहीं पर आपदा प्रबंधन में पहाड़ के लिए अलग नजरिए की जरूरत है। इन प्रभावित लोगों को रहने के घर, लकड़ी-घास के लिए जंगल, पीने के पानी के स्रोत, खेतों की सिंचाई के लिए गांव तक नहर, चारागाह आदि की जरूरत है। लेकिन आपदा प्रबंधन के शब्दकोश में पुनर्वास जैसा शब्द है ही नहीं।

जाहिर है कि राहत और बचाव कार्य खत्म होने के बाद भी इन गांवों से आपदा जाएगी नहीं। मानसून निकलने के बाद इन गांवों के पुनर्वास की बात उसी अंदाज में की जाएगी, जैसी किसी बांध या किसी बड़ी परियोजना बनाते समय गांवों को विस्थापित करने के लिए की जाती है।

पिछले कुछ सालों में हिमालयी क्षेत्र मौसम बदलाव के लिहाज से संवेदनशील साबित हो रहा है। कृषि विभाग कह रहा है कि पीक रेनफॉल अब जुलाई से खिसककर अगस्त में पहुंच गया है। बरसात अब अगस्त और सितंबर में तबाही मचाती है। आपदा प्रबंधन तंत्र के शब्दकोश में इस बदलाव का जिक्र नहीं है।

यह बदलाव पहाड़ पर लोगों की दिनचर्या के सात ही आपदा से निपटने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर रहा है। घर से कब निकलना है और कितनी दूर तक जाना है जैसे सामान्य फैसले लेने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है।

केस एक
केदारनाथ की ऊखीमठ और मद्महेश्वर घाटियों में बसे गांवों के लोगों को आपदा के 20 दिन बाद भी यह नहीं मालूम कि
केदारधाम में गए उनके परिजनों पर क्या बीती। एक परिवार के चार बेटों का पता नहीं। परिवार में अब बूढ़े मां-बाप, एक छोटा पोता, एक बहू और मायके आई बेटी ही है। यह बेटी रिश्तेदारों के साथ भाइयों की खोज में कभी गुप्तकाशी जा रही है तो कभी सोनप्रयाग। गांव में न बिजली है और न संपर्क मार्ग बचा।

केस दो
हेमकुंड साहिब मार्ग पर लक्ष्मण गंगा नदी की बाढ़ से 99 परिवार वाला भ्यूंदार गांव पूरा बह गया। ग्रामीण जोशीमठ में एक यूथ होस्टल में रह रहे हैं। बस तन पर कपड़े ही उनके पास हैं। इनकी ओर से दिए गए ज्ञापन पर एक नजर हालात बयां करने को काफी है।
-गांव का विस्थापन तत्काल किया जाए।
-बह चुके स्कूल, बालबाड़ी और पंचायत घर निर्माण कराया जाए।
-अलकनंदा नदी पर भ्यूंदार-पुलना को जोड़ने वाले पुल, भ्यूंदार से काकभुषंडी को जोड़ने वाले पुल, भ्यूंदार से घांघरियां को जोड़ने वाले पुल, पुलना से कुरा को जोड़ने वाले पुल, घांघरियां से फूलों की घाटी को जोड़ने वाले पुल को ठीक किया जाए।

केस 3
इमरजेंसी रेस्पांस सिस्टम खुद इमरजेंसी में देहरादून। पहाड़ का एक शब्द है दुर्गम। सामान्य हालात में ही इन स्थानों से संवाद कायम करना मुश्किल होता है। आपदा के समय में तो कल्पना ही बेमानी है। आपदा प्रबंधन तंत्र ने 2005 में इमरजेंसी रेस्पांस सिस्टम की कल्पना की। इसके तहत सेटेलाइट फोन, वायरलेस आदि उपलब्ध कराए गए।

केदारघाटी में आई तबाही ने इस सिस्टम ने ऐसे काम किया मानों यह आपदा किसी मैदानी क्षेत्र की हो। रामबाड़ा बहा तो पुलिस चौकी के साथ वायरलेस भी बह गया। रुद्रप्रयाग में सेटेलाइट फोन है। लेकिन जब कोई सूचना ही नहीं है तो देहरादून को रामबाड़ा के बारे क्या बताया जाए। रामबाड़ा टीम गई और रास्ते टूटे होने से दो दिन बाद ही हालात का कुछ अंदाजा लगा पाई। जाहिर है कि दुर्गम के लिए इमरजेंसी रेस्पांस सिस्टम अलग ढंग का होना चाहिए।

केस चार
चमोली में लामबगड़ केसामने स्थित पटोड़ी गांव में हेलीकाप्टर से रसद गिराई गई। जहां रसद केपैकेट गिरे, वहां से निकालने का मतलब जान जोखिम में डालना। अगर राशन हेलीकाप्टर से नदी पार के सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जाए तो ग्रामीण खुद ले जा सकते हैं। हो सकता है कि इसके लिए लोगों दो-चार किमी. चलना पड़े।

संपर्क मार्ग पूरी तरह नहीं बहे, बल्कि कुछ स्थानों पर उन्हें पार करना मुश्किल हो गया है। इन स्थानों को पाटने से न केवल गांवों की हकीकत सामने आ जाती, बल्कि राहत का समान भी आसानी से पहुंच जाता।

उत्तराखंड का जिक्र सिर्फ भूकंप और भूस्खलन में
सीबीएसई के कक्षा दस के पाठ्यक्रम में आपदा प्रबंधन को शामिल किया गया। इसमें उत्तराखंड का अगर जिक्र है तो केवल भूकंप और भूस्खलन के लिए। बादल फटना, फ्लैश फ्लड का जिक्र इसमें नहीं है। हां, बाढ़ और सूखे के कारण से लेकर निपटने केतरीकों तक पर बात की गई है।

क्या है फ्लैश फ्लड
-बादल फटने, ग्लेशियर के टूटने या भारी बरसात के कारण अचानक भारी मात्रा में आए पानी को फ्लैश फ्लड कहा जा सकता है। पहाड़ी ढाल पर पानी इतनी तेजी से आता है कि कुछ करने के कुछ मिनट का भी वक्त मिलना मुश्किल हो जता है। तेज बहाव वाले पानी में मिट्टी और पत्थर आदि भी होते हैं। इससे नदियों की कटाव की ताकत कई गुना बढ़ जाती है।

क्या हैं नुकसान
-फ्लैश फ्लड से कई तरह केनुकसान होते हैं। उत्तरकाशी से लेकर केदारनाथ और बदरीनाथ तक की तबाही इस बात का सबूत है। नदियों ने किनारों को तबाह किया तो इसकेसंतुलन पर टिके पहाड़ भी दरक पड़े। नतीजा जमकर भूस्खलन के रूप में सामने आया और सड़कों को खासा नुकसान पहुंचा।

सड़कों केकिनारे लगे पोल बहने से बिजली और टेलीफोन व्यवस्था ठप हो गई। छोटे-छोटे बरसाती नालों में इतना पानी आया कि उन पर बने पुल बह गए। लिहाजा संपर्क पूरी तरह से कट गया।

अपने दायित्व को भी भूली प्रदेश सरकार
-आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 में कहा गया है कि स्थानीय जरूरत के हिसाब से नीति और योजनाएं बनाने का दायित्व प्रदेश सरकार का होगा। लेकिन कुछ नहीं किया गया। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की 2010 तक केवल एक बार बैठक हुई।

राज्य प्राधिकरण को अधिकार है कि वह नीतियां बनाने के लिए कभी भी बैठक कर सकता है। आपदा आए एक पखवाड़ा से ज्यादा वक्त बीतने केबाद भी न तो प्राधिकरण की बैठक हुई और न ही इस पर सोचा गया। पूर्व मुख्य सचिव आरएस टोलिया के मुताबिक आपदा प्रबंधन तंत्र को पहाड़ की दृष्टि से विकसित करना जरूरी है।
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