फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कुछ न हो तो बहाएं आंसू पितृ होंगे खुश

Thu, 19 Sep 2013 12:38 AM IST
कौशल सिखौला/अमर उजाला, हरिद्वार
विज्ञापन
विज्ञापन
आज से 16 कनागत शुरू हो रहे हैं। बुधवार शाम अस्त होते सूर्य की रश्मियों (किरणों) पर बैठकर पितृगण धरती पर आ गए हैं।
विज्ञापन


अब धराधाम वासी अगले 16 दिनों तक पुरखों की तिथियों के अनुसार पितरों को हव्य, कव्य और जल प्रदान करेंगे। गंगा आदि पवित्र नदियों के तटों के अलावा घरों में भी तर्पण किए जाएंगे।

मान्यता है कि तिथि के अनुसार अपने पितृ को मध्याह्न काल में यथा योग्य हव्य, कव्य दिया जाना चाहिए। मध्याह्न काल दोपहर 12 बजे से दो बजे तक माना जाता है।

पढ़ें, ...यहां पिंडदान से धुलेंगे 21 जन्मों के पाप

पंडित की मान्यता
यदि पास में धन है तो कई पंडितों को पितरों के निमित्त जिमाया जाता है। पंडितों के अलावा धेवते को भी पंडित की मान्यता शास्त्रों ने दी है।

यदि पास में कुछ न हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुख कर आंसू बहाने से भी पितृगण तृप्त हो जाते हैं। बहुत गरीबी हो तो केवल पितरों का स्वरूप स्मरण करने से उनको पुत्र और पौत्र का हव्य प्राप्त हो जाता है।
विज्ञापन


दक्षिणा द्रव्य दिया जाएगा
बुधवार शाम दक्षिण दिशा के पितृलोक से आने वाले पितरों का स्वागत तीर्थ नगरियों में किया गया। मान्यता है कि एक दिन पूर्व सूर्य अस्त होने के साथ उसकी रश्मियों पर बैठकर पितृ धरती पर आते हैं।

अब प्रतिदिन पितरों को तिथि के अनुसार दक्षिणा द्रव्य दिया जाएगा। पंडितों के माध्यम से यह सब पितरों को प्राप्त होता है। जिन पितरों की तिथि याद न हो उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।

पढ़ें, केदारनाथः मिल गया भोले का नाग...

पूर्णिमा के दिन मरने वाले पितरों का श्राद्ध भाद्रपद पूर्णिमा को होता है। 16 दिनों के महालय श्राद्ध प्रतिदिन किए जाएंगे।

अब पूड़ी, कचौड़ी, खीर और रबड़ी की सुगंध
16 दिनों तक चारों ओर पकवानों की सुगंध आएगी। धर्मनगरी में तो खीर और रबड़ी के मिष्ठान्न से पितरों के श्राद्ध करने की परंपरा है।

नगरवासी गंगा तट पर जाकर पितृ श्राद्ध भी करते हैं और पितृ तर्पण भी। तीर्थ यात्री भी नगर में आकर तिथियों के हिसाब से श्राद्ध करते हैं। मध्याह्न काल में घर-घर पंडितों को भोजन कराया जाता है।

असली समस्या कि किसे जिमाएं
समय ने बहुत कुछ बदल दिया है। अब पंडित भी जीमने को नहीं मिलते। अधिकतर पंडितों के पुत्र नौकरी पेशे वाले हैं और नगर से बाहर काम पर चले गए हैं। पेटू पंडितों को बीमारियों ने घेर लिया है।

फलस्वरूप पक्का भोजन रास नहीं आता। इसके बावजूद धर्म की इस नगरी में संस्कृत विद्यालय के ब्रह्मचारी भोजन के लिए मिल जाते हैं। पुत्री और धेवतों को भी जिमा दिया जाता है। पंडित न मिले तो पंडितों के घर परोसा भेजने की परंपरा भी नगर में विद्यमान है।

स्त्रियां भी कर सकती हैं श्राद्ध
जिन घरों में पुरुष न हों अथवा बाहर गए हों, वहां श्राद्ध करने का अधिकार स्त्रियों को भी है। धर्मनगरी में कई स्त्रियां तर्पण करती हैं। इस पर किसी भी शास्त्र ने कोई रोक नहीं लगाई है।

प्रतिदिन करें श्राद्ध
श्राद्ध केवल अमावस्या के दिन ही नहीं करने चाहिए। यूं तिथियों निर्धारित हैं जिन दिनों में पितरों के श्राद्ध किए जा सकते हैं। माता की तिथि न हो तो नवमी के दिन मातृ श्राद्ध होता है।

पढ़ें, दून घाटी के हर शख्स तक डेंगू की दखल

संन्यासियों के भी श्राद्ध द्वादशी तिथि को किए जाते हैं। यदि तिथियां याद हों तो तिथियों के दिन सकल पितरों के श्राद्ध करने चाहिए। याद न हों तो अमावस्या के दिन पितरों का विसर्जन किया जा सकता है।
विज्ञापन


क्या कहते हैं पंडित
पितृगण वर्षभर सूर्य की किरणों से धरती से संपर्क रखते हैं। उनकी तिथि और कनागत में जो भी दिया जाता है, वह सूर्य की किरणों के माध्यम से पितरों को प्राप्त होता है। मनुष्य ज्ञानवान हो और वेदादि ग्रंथों का अध्ययन किया हो तो उसे अपने पिता, दादा अथवा माता की तिथि पर सूर्य की किरणों से पितृ आगमन का अनुभव हो सकता है। वेदों में भी पितरों का वर्णन किया गया है।
- वेदमार्तंड पंडित भगवत दत्त वेदालंकार
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें