बुधवार 19 सितंबर से श्राद्धपक्ष शुरू हो रहा है। पितृतर्पण के लिए विख्यात ब्रह्मकपाल में अब तक 80 लोग पिंडदान के लिए बुकिंग करा चुके हैं।
स्थानीय मान्यता है कि बदरीधाम में स्थित ब्रह्मकपाल में पितरों का तर्पण गया की अपेक्षा आठ गुना अधिक फलदायी होता है।
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आपदा के चलते यात्रा ठप
आपदा के चलते इस वर्ष बदरीनाथ धाम की यात्रा ठप हो चुकी है। मौजूदा समय में तीर्थयात्रियों की संख्या शून्य है, लेकिन ब्रह्मकपाल की महत्ता के कारण बुधवार को हिमाचल प्रदेश से 10 लोगों का एक दल आपदा से बदरीनाथ के कठिन रास्ते को पार कर तर्पण के पहुंच गया है।
बदरीनाथ के पंडित ज्योतिष डिमरी ने बताया कि बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति को मद्रास, लखनऊ, मुंबई, दिल्ली आदि स्थानों से पितृ तर्पण के लिए बुकिंग मिली है। 4 अक्तूबर तक तर्पण किए जाएंगे।
बदरीनाथ के मुख्य धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल का कहना है कि यहां पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति और मनुष्यों को 21 जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है।
बदरीनाथ से डेढ़ सौ मीटर दूर है ब्रह्मकपाल
बदरीनाथ धाम से 150 मीटर की दूरी पर तप्तकुंड के समीप अलकनंदा नदी के किनारे पर ब्रह्मकपाल स्थित है। तप्तकुंड में स्नान करने के पश्चात जौ के पिंड बनाए जाते हैं। विधि-विधान से दूध, घी, कुश, दही, शहद आदि चीजें तर्पण के दौरान प्रयोग में लायी जाती हैं।
यहां कौवे के रूप में आते हैं पितर
बदरीनाथ में यूं तो पशु-पक्षियों की संख्या बेहद कम है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप में ब्रह्मकपाल में तर्पण के दौरान कई कौवे आ जाते हैं।
पौराणिक मान्यता : स्कंद पुराण में उल्लेख
शिर: कपालं यत्रैतत्पपात ब्रह्मण: पुरा, तत्रैव बद्रीक्षेत्रे पिंडदातुं प्रभु: पुमान्।
स्कंद पुराण के केदारखंड में ब्रह्मकपाल के बारे में कहा गया है कि एक बार कुपित होकर शिव जी ने ब्रह्माजी का सिर काट दिया। सिर जिस स्थान पर गिरा वही ब्रह्मकपाल है।
बाद में ब्रह्महत्या के पाप से बचने के लिए उन्होंने पहली बार यहां पिंडदान किया। इसीलिए इस स्थान पर पिंडदान का विशेष महत्व है।