डीडीहाट (पिथौरागढ़)। डीडीहाट निवासी पूर्व सैनिक 91 वर्षीय नैन सिंह बोरा का कहना है कि अब तो विधायक व्यक्तिगत रूप से लोगों के हित साधने पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन पहले विधायक सार्वजनिक हित की योजनाओं को मंजूर कराता था। इसके लिए क्षेत्र के लोगों की मीटिंग की जाती थी। जब आम सहमति बनती तो विधायक उस योजना को मंजूर कराने के लिए जोर लगाता था। इनमें स्कूल, सड़क, अस्पताल जैसे मुद्दे ज्यादा होते थे। 1959 में सेना से रिटायर होने के बाद नैन सिंह लगातार चुनावों को देखते आ रहे हैं। वह कहते हैं कि पहले मतदाताओं में भारी जोश रहता था। वह मतदान को राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाते थे। भारी संख्या में लोग मतदान केंद्र में जाते थे। तभी उस समय मतदान का प्रतिशत भी 80 से ऊपर चला जाता था।
वह बताते हैं कि बूथ मैनेजमेंट के लिए कार्यकर्ता को अधिक से अधिक 20 रुपए मिलते थे। उस समय रुपए की कीमत बहुत अधिक थी। इतने में बूथ का सारा खर्चा निकल जाता था। खास बात यह थी कि विधानसभा का दायरा बड़ा होने के कारण प्रत्याशी हर गांव तक नहीं पहुंच पाता था। पार्टियां अधिक से अधिक दो ही होती थी। कार्यकर्ता सभी के पास समर्पित होते थे। कार्यकर्ता एक दिन में 10 से 15 किलोमीटर पैदल चलकर दूरस्थ गांव में पहुंचते थे। वहां पर रात में चौपाल लगती थी। चुनाव प्रचार से ज्यादा लोगों की जरूरतों पर मंथन होता था। विधायक जीतने के छह महीने बाद जरूर क्षेत्र में आता था।
नैन सिंह बताते हैं कि उस समय चुनाव के दौरान भय का माहौल नहीं था। सुरक्षा के इतने ज्यादा इंतजाम नहीं करने पड़ते थे। अलग-अलग प्रत्याशी और उनके समर्थक एक साथ प्रचार में जाते थे। कहीं पर भी प्रचार को लेकर विवाद की नौबत नहीं आती थी। इससे भी अलग बात यह थी कि तब प्रचार में बहुत कम खर्च होता था। एक गांव में एक दावेदार का सिर्फ एक ही पोस्टर पहुंच पाता था। उसे सार्वजनिक स्थान पर लगाया जाता। पोस्टर की बड़ी इज्जत होती थी। नैन सिंह कहते हैं कि आज चुनाव का माहौल पूरी तरह दंगल में बदल जाता है। चुनाव आयोग के कड़े नियमों का खौफ दिखता है। इसके अलावा दावेदारों के बीच में भी मतभेद नजर आते हैं। अब क्षेत्र हित की बातें सिमटती जा रही हैं। मतदाता भी खेमों में बंटा नजर आता है।