तिब्बत में ऐसी शानदार रोड में सफर करते हैं कैलास यात्री
- फोटो : अमर उजाला
सुरक्षा और सीमांत इलाकों को बफर जोन के रूप में विकसित करने के दावों को धरातल पर कितना उतारा जा रहा है यह कैलास यात्रियों के अनुभवों से भी सामने आ रहा है। हाल यह है कि सीमांत इलाकों में चीनी क्षेत्र वाई फाई हो चुका है और भारतीय इलाकों में हेलो कहने तक की सुविधा नहीं मिल पा रही है। पिछले सात साल में चीन सीमा तक सड़क पहुंचा चुका है और भारतीय क्षेत्र में 58 किलोमीटर पैदल सफर तय करना पड़ता है।
कैलास यात्रा के लिए इस बार 18 दलों को स्वीकृति दी गई थी। अब यहां पहुंचे 16वें दल के यात्रियों का यात्रा का अनुभव बता रहा है कि सीमा पर दोनों देशों की गतिविधि में क्या अंतर है। तीर्थ यात्री गाजियाबाद के संजीव त्यागी के मुताबिक कैलास मानसरोवर के नजदीक डोलमा पास तक जीप चलती है। कपूरथला पंजाब के यात्री विनोद कुमार के मुताबिक परिक्रमा समेत चीन में केवल 46 किमी पैदल चलना पड़ता है। भारतीय क्षेत्र में 58 किमी की दूरी तो सीमा तक पहुंचने में तय करनी पड़ती है।
यह तब है जबकि चीन सीमा तक सड़क बनाने का काम भारत में वर्ष 1991 से चल रहा है। 85 किमी लंबी सड़क को वर्ष 2014 तक बनाने का लक्ष्य था। भारतीय क्षेत्र में धारचूला से आगे गर्बाधार से छियालेख तक 28 किमी हिस्से में सड़क खोदने का काम शुरू नहीं हुआ है। नाभीढांग से लिपुलेख दर्रे तक सात किमी हिस्से में सड़क नहीं बनी है।
हिमाचल निवासी रिटायर्ड कमांडर एमआर शर्मा बताते है कि वह वर्ष 2009 में भी कैलास मानसरोवर यात्रा पर गए थे, तब तिब्बत में भी संचार सेवा खस्ताहाल थी। फोन करने के लिए चीन के डाकघरों में जाना पड़ता था। इस बार चीन की सीमा पर प्रवेश करते ही वाईफाई की सेवा मिलने लग गई।
नाथुला से बेहतर लिपूपास रूट
16वें दल के यात्री लिपूपास को कैलास मानसरोवर दर्शन के लिए बेहतर मानते हैं। यात्रियों का कहना था कि लिपूपास से होकर जाने में ऊं पर्वत, नारायण आश्रम, जागेश्वर धाम दर्शन का लाभ मिलता है। यह इलाका काफी खूबसूरत है। नाथुला दर्रे से वाहनों के जरिए सीधे चीन में प्रवेश हो जाता है। यात्री नारायण आश्रम वाली सड़क को दुरुस्त न रखने से नाराज दिखे। नारायण आश्रम जाने वाली सड़क बंद होने से इस साल 18 दलों में से केवल 6 दल नारायण आश्रम के दर्शन कर सके।