कक्षा आठ पास करने के बाद 14 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर गया इंद्रजीत कुमार अब 36 वर्ष का नौजवान होकर अपने माता-पिता के पास पहुंच गया है। कई वर्षों तक माता-पिता अपने इस इकलौते बेटे की तलाश में भटकते रहे। पिता रईस राम का कहना है कि पिछले महीने अपने इष्टदेवता गंगनाथ के मंदिर में आराधना की थी। उन्हीं की कृपा से बेटा सकुशल वापस आया है।
बलतिर निवासी रईस राम का बेटा इंद्रजीत 1996 में एक दिन घर से चला गया। 23 जनवरी की शाम वह घर पहुंचा तो माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हालांकि, परिवार के लोगों ने उसे मरा समझकर वापस लौटने की आस छोड़ दी थी। इंद्रजीत ने बताया कि घर से जाने के बाद वह एक वर्ष तक दिल्ली में छोटे-मोटे कामों में लगा रहा। उसके बाद उसने मुंबई का रुख कर लिया। कई वर्षों तक वह मुंबई में छोटा-मोटा काम करता रहा। इसी बीच उसे घर लौटने का विचार आया। वह मुंबई से पहले दिल्ली पहुंचा। वहां से हल्द्वानी होते हुए थल आने वाली गाड़ी में बैठ गया।
इंद्रजीत ने बताया कि 23 जनवरी की शाम वह थल बाजार में उतरा तो अपने गांव बलतिर जाने का रास्ता ही भूल गया था। इन वर्षों में थल में बड़ा बदलाव आ गया। कई नए मकान बन गए हैं। उसने थल मंदिर के पास दुकानदार भगत कुमार से बलतिर गांव का रास्ता पूछा। संयोग से भगत कुमार भी बलतिर गांव का ही निवासी निकला और उसने उसे पहचान लिया। घर पहुंचा तो 22 साल बाद बेटे को सामने देख पहले तो पिता रईस राम और माता कौशल्या देवी को यकीन ही नहीं हुआ। बाद में उन्होंने भी उसे पहचान लिया।
वहीं, 65 वर्षीय रईस राम और 60 वर्षीय कौशल्या को बेटे के सकुशल घर लौटने पर खुशी है। गांव के कई लोग इंद्रजीत से मिलने पहुंच रहे हैं। बताया गया कि इंद्रजीत की तबियत खराब है। वह बेहद कमजोर लग रहा है। अब परिवार के लोग पहले उसका इलाज कराएंगे, उसके बाद उसकी शादी करेंगे।